सम्राट एडवर्ड अष्टम के प्रति / सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”

वीक्षण अगल:- बज रहे जहाँ जीवन का स्वर भर छन्द, ताल मौन में मन्द्र, ये दीपक जिसके सूर्य-चन्द्र, बँध रहा जहाँ दिग्देशकाल, सम्राट! उसी स्पर्श से खिली प्रणय के प्रियंगु की डाल-डाल! विंशति शताब्दि, धन के, मान के बाँध को जर्जर कर महाब्धि ज्ञान का, बहा जो भर गर्जन– साहित्यिक स्वर– “जो करे गन्ध-मधु का… Continue reading सम्राट एडवर्ड अष्टम के प्रति / सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”

मित्र के प्रति / सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”

(1) कहते हो, ‘‘नीरस यह बन्द करो गान- कहाँ छन्द, कहाँ भाव, कहाँ यहाँ प्राण ? था सर प्राचीन सरस, सारस-हँसों से हँस; वारिज-वारिज में बस रहा विवश प्यार; जल-तरंग ध्वनि; कलकल बजा तट-मृदंग सदल; पैंगें भर पवन कुशल गाती मल्लार।’’ (2) सत्य, बन्धु सत्य; वहाँ नहीं अर्र-बर्र; नहीं वहाँ भेक, वहाँ नहीं टर्र-टर्र। एक… Continue reading मित्र के प्रति / सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”

प्रेयसी / सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”

घेर अंग-अंग को लहरी तरंग वह प्रथम तारुण्य की, ज्योतिर्मयि-लता-सी हुई मैं तत्काल घेर निज तरु-तन। खिले नव पुष्प जग प्रथम सुगन्ध के, प्रथम वसन्त में गुच्छ-गुच्छ। दृगों को रँग गयी प्रथम प्रणय-रश्मि- चूर्ण हो विच्छुरित विश्व-ऐश्वर्य को स्फुरित करती रही बहु रंग-भाव भर शिशिर ज्यों पत्र पर कनक-प्रभात के, किरण-सम्पात से। दर्शन-समुत्सुक युवाकुल पतंग… Continue reading प्रेयसी / सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”

गीत / सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”

जैसे हम हैं वैसे ही रहें, लिये हाथ एक दूसरे का अतिशय सुख के सागर में बहें। मुदें पलक, केवल देखें उर में,- सुनें सब कथा परिमल-सुर में, जो चाहें, कहें वे, कहें। वहाँ एक दृष्टि से अशेष प्रणय देख रहा है जग को निर्भय, दोनों उसकी दृढ़ लहरें सहें।

सभा का खेल / सुभद्राकुमारी चौहान

सभा सभा का खेल आज हम खेलेंगे जीजी आओ, मैं गाधी जी, छोटे नेहरू तुम सरोजिनी बन जाओ। मेरा तो सब काम लंगोटी गमछे से चल जाएगा, छोटे भी खद्दर का कुर्ता पेटी से ले आएगा। लेकिन जीजी तुम्हें चाहिए एक बहुत बढ़िया सारी, वह तुम माँ से ही ले लेना आज सभा होगी भारी।… Continue reading सभा का खेल / सुभद्राकुमारी चौहान

स्मृतियाँ / सुभद्राकुमारी चौहान

क्या कहते हो? किसी तरह भी भूलूँ और भुलाने दूँ? गत जीवन को तरल मेघ-सा स्मृति-नभ में मिट जाने दूँ? शान्ति और सुख से ये जीवन के दिन शेष बिताने दूँ? कोई निश्चित मार्ग बनाकर चलूँ तुम्हें भी जाने दूँ? कैसा निश्चित मार्ग? ह्रदय-धन समझ नहीं पाती हूँ मैं वही समझने एक बार फिर क्षमा… Continue reading स्मृतियाँ / सुभद्राकुमारी चौहान

बालिका का परिचय / सुभद्राकुमारी चौहान

यह मेरी गोदी की शोभा, सुख सोहाग की है लाली. शाही शान भिखारन की है, मनोकामना मतवाली . दीप-शिखा है अँधेरे की, घनी घटा की उजियाली . उषा है यह काल-भृंग की, है पतझर की हरियाली . सुधाधार यह नीरस दिल की, मस्ती मगन तपस्वी की. जीवित ज्योति नष्ट नयनों की, सच्ची लगन मनस्वी की.… Continue reading बालिका का परिचय / सुभद्राकुमारी चौहान

प्रभु तुम मेरे मन की जानो / सुभद्राकुमारी चौहान

मैं अछूत हूँ, मंदिर में आने का मुझको अधिकार नहीं है। किंतु देवता यह न समझना, तुम पर मेरा प्यार नहीं है॥ प्यार असीम, अमिट है, फिर भी पास तुम्हारे आ न सकूँगी। यह अपनी छोटी सी पूजा, चरणों तक पहुँचा न सकूँगी॥ इसीलिए इस अंधकार में, मैं छिपती-छिपती आई हूँ। तेरे चरणों में खो… Continue reading प्रभु तुम मेरे मन की जानो / सुभद्राकुमारी चौहान

मेरी टेक / सुभद्राकुमारी चौहान

निर्धन हों धनवान, परिश्रम उनका धन हो। निर्बल हों बलवान, सत्यमय उनका मन हो॥ हों स्वाधीन गुलाम, हृदय में अपनापन हो। इसी आन पर कर्मवीर तेरा जीवन हो॥ तो, स्वागत सौ बार करूँ आदर से तेरा। आ, कर दे उद्धार, मिटे अंधेर-अंधेरा॥

बिदाई / सुभद्राकुमारी चौहान

कृष्ण-मंदिर में प्यारे बंधु पधारो निर्भयता के साथ। तुम्हारे मस्तक पर हो सदा कृष्ण का वह शुभचिंतक हाथ॥ तुम्हारी दृढ़ता से जग पड़े देश का सोया हुआ समाज। तुम्हारी भव्य मूर्ति से मिले शक्ति वह विकट त्याग की आज॥ तुम्हारे दुख की घड़ियाँ बनें दिलाने वाली हमें स्वराज्य। हमारे हृदय बनें बलवान तुम्हारी त्याग मूर्ति… Continue reading बिदाई / सुभद्राकुमारी चौहान