हालाते जिस्म, सूरती—जाँ और भी ख़राब चारों तरफ़ ख़राब यहाँ और भी ख़राब नज़रों में आ रहे हैं नज़ारे बहुत बुरे होंठों पे आ रही है ज़ुबाँ और भी ख़राब पाबंद हो रही है रवायत से रौशनी चिमनी में घुट रहा है धुआँ और भी ख़राब मूरत सँवारने से बिगड़ती चली गई पहले से हो… Continue reading हालाते-जिस्म, सूरते—जाँ और भी ख़राब / दुष्यंत कुमार
बाएँ से उड़के दाईं दिशा को गरुड़ गया / दुष्यंत कुमार
बाएँ से उड़के दाईं दिशा को गरुड़ गया कैसा शगुन हुआ है कि बरगद उखड़ गया इन खँडहरों में होंगी तेरी सिसकियाँ ज़रूर इन खँडहरों की ओर सफ़र आप मुड़ गया बच्चे छलाँग मार के आगे निकल गये रेले में फँस के बाप बिचारा बिछुड़ गया दुख को बहुत सहेज के रखना पड़ा हमें सुख… Continue reading बाएँ से उड़के दाईं दिशा को गरुड़ गया / दुष्यंत कुमार
मेरे स्वप्न तुम्हारे पास सहारा पाने आयेंगे / दुष्यंत कुमार
मेरे स्वप्न तुम्हारे पास सहारा पाने आयेंगे इस बूढे पीपल की छाया में सुस्ताने आयेंगे हौले-हौले पाँव हिलाओ जल सोया है छेडो मत हम सब अपने-अपने दीपक यहीं सिराने आयेंगे थोडी आँच बची रहने दो थोडा धुँआ निकलने दो तुम देखोगी इसी बहाने कई मुसाफिर आयेंगे उनको क्या मालूम निरूपित इस सिकता पर क्या बीती… Continue reading मेरे स्वप्न तुम्हारे पास सहारा पाने आयेंगे / दुष्यंत कुमार
घंटियों की आवाज़ कानों तक पहुंचती है / दुष्यंत कुमार
घंटियों की आवाज़ कानों तक पहुँचती है एक नदी जैसे दहानों तक पहुँचती है अब इसे क्या नाम दें, ये बेल देखो तो कल उगी थी आज शानों तक पहुँचती है खिड़कियां, नाचीज़ गलियों से मुख़ातिब है अब लपट शायद मकानों तक पहुँचती है आशियाने को सजाओ तो समझ लेना, बरक कैसे आशियानों तक पहुँचती… Continue reading घंटियों की आवाज़ कानों तक पहुंचती है / दुष्यंत कुमार
ये ज़ुबाँ हमसे सी नहीं जाती / दुष्यंत कुमार
ये ज़ुबाँ हमसे सी नहीं जाती ज़िन्दगी है कि जी नहीं जाती इन सफ़ीलों में वो दरारे हैं जिनमें बस कर नमी नहीं जाती देखिए उस तरफ़ उजाला है जिस तरफ़ रौशनी नहीं जाती शाम कुछ पेड़ गिर गए वरना बाम तक चाँदनी नहीं जाती एक आदत-सी बन गई है तू और आदत कभी नहीं… Continue reading ये ज़ुबाँ हमसे सी नहीं जाती / दुष्यंत कुमार
हो गई है पीर पर्वत / दुष्यंत कुमार
हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी शर्त थी लेकिन कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं… Continue reading हो गई है पीर पर्वत / दुष्यंत कुमार
किसी को क्या पता था इस अदा पर मर मिटेंगे हम / दुष्यंत कुमार
किसी को क्या पता था इस अदा पर मर मिटेंगे हम किसी का हाथ उठ्ठा और अलकों तक चला आया वो बरगश्ता थे कुछ हमसे उन्हें क्योंकर यक़ीं आता चलो अच्छा हुआ एहसास पलकों तक चला आया जो हमको ढूँढने निकला तो फिर वापस नहीं लौटा तसव्वुर ऐसे ग़ैर—आबाद हलकों तक चला आया लगन ऐसी… Continue reading किसी को क्या पता था इस अदा पर मर मिटेंगे हम / दुष्यंत कुमार
मेरी कुण्ठा / दुष्यंत कुमार
मेरी कुंठा रेशम के कीड़ों सी ताने-बाने बुनती तड़प-तड़पकर बाहर आने को सिर धुनती, स्वर से शब्दों से भावों से औ’ वीणा से कहती-सुनती, गर्भवती है मेरी कुंठा – कुँवारी कुंती! बाहर आने दूँ तो लोक-लाज-मर्यादा भीतर रहने दूँ तो घुटन, सहन से ज़्यादा, मेरा यह व्यक्तित्व सिमटने पर आमादा ।
बहुत सँभाल के रक्खी तो पाएमाल हुई / दुष्यंत कुमार
बहुत सँभाल के रक्खी तो पाएमाल हुई सड़क पे फेंक दी तो ज़िंदगी निहाल हुई बड़ा लगाव है इस मोड़ को निगाहों से कि सबसे पहले यहीं रौशनी हलाल हुई कोई निजात की सूरत नहीं रही, न सही मगर निजात की कोशिश तो एक मिसाल हुई मेरे ज़ेह्न पे ज़माने का वो दबाब पड़ा जो… Continue reading बहुत सँभाल के रक्खी तो पाएमाल हुई / दुष्यंत कुमार
पक गई हैं आदतें बातों से सर होंगी नहीं / दुष्यंत कुमार
पक गई हैं आदतें बातों से सर होंगी नहीं कोई हंगामा करो ऐसे गुज़र होगी नहीं इन ठिठुरती उँगलियों को इस लपट पर सेंक लो धूप अब घर की किसी दीवार पर होगी नहीं बूँद टपकी थी मगर वो बूँदो—बारिश और है ऐसी बारिश की कभी उनको ख़बर होगी नहीं आज मेरा साथ दो वैसे… Continue reading पक गई हैं आदतें बातों से सर होंगी नहीं / दुष्यंत कुमार