अगर ख़ुदा न करे सच ये ख़्वाब हो जाए / दुष्यंत कुमार

अगर ख़ुदा न करे सच ये ख़्वाब हो जाए तेरी सहर हो मेरा आफ़ताब हो जाए हुज़ूर! आरिज़ो-ओ-रुख़सार क्या तमाम बदन मेरी सुनो तो मुजस्सिम गुलाब हो जाए उठा के फेंक दो खिड़की से साग़र-ओ-मीना ये तिशनगी जो तुम्हें दस्तयाब हो जाए वो बात कितनी भली है जो आप करते हैं सुनो तो सीने की… Continue reading अगर ख़ुदा न करे सच ये ख़्वाब हो जाए / दुष्यंत कुमार

ये धुएँ का एक घेरा कि मैं जिसमें रह रहा हूँ / दुष्यंत कुमार

ये धुएँ का एक घेरा कि मैं जिसमें रह रहा हूँ मुझे किस क़दर नया है, मैं जो दर्द सह रहा हूँ ये ज़मीन तप रही थी ये मकान तप रहे थे तेरा इंतज़ार था जो मैं इसी जगह रहा हूँ मैं ठिठक गया था लेकिन तेरे साथ—साथ था मैं तू अगर नदी हुई तो… Continue reading ये धुएँ का एक घेरा कि मैं जिसमें रह रहा हूँ / दुष्यंत कुमार

वो निगाहें सलीब है / दुष्यंत कुमार

वो निगाहें सलीब है हम बहुत बदनसीब हैं आइये आँख मूँद लें ये नज़ारे अजीब हैं ज़िन्दगी एक खेत है और साँसे जरीब हैं सिलसिले ख़त्म हो गए यार अब भी रक़ीब है हम कहीं के नहीं रहे घाट औ’ घर क़रीब हैं आपने लौ छुई नहीं आप कैसे अदीब हैं उफ़ नहीं की उजड़… Continue reading वो निगाहें सलीब है / दुष्यंत कुमार

अब तो पथ यही है / दुष्यंत कुमार

जिंदगी ने कर लिया स्वीकार, अब तो पथ यही है| अब उभरते ज्वार का आवेग मद्धिम हो चला है, एक हलका सा धुंधलका था कहीं, कम हो चला है, यह शिला पिघले न पिघले, रास्ता नम हो चला है, क्यों करूँ आकाश की मनुहार , अब तो पथ यही है | क्या भरोसा, कांच का… Continue reading अब तो पथ यही है / दुष्यंत कुमार

रोज़ जब रात को बारह का गजर होता है / दुष्यंत कुमार

रोज़ जब रात को बारह का गजर होता है यातनाओं के अँधेरे में सफ़र होता है कोई रहने की जगह है मेरे सपनों के लिए वो घरौंदा ही सही, मिट्टी का भी घर होता है सिर से सीने में कभी पेट से पाओं में कभी इक जगह हो तो कहें दर्द इधर होता है ऐसा… Continue reading रोज़ जब रात को बारह का गजर होता है / दुष्यंत कुमार

ये जो शहतीर है पलकों पे उठा लो यारो / दुष्यंत कुमार

ये जो शहतीर है पलकों पे उठा लो यारो अब कोई ऐसा तरीका भी निकालो यारो दर्दे—दिल वक़्त पे पैग़ाम भी पहुँचाएगा इस क़बूतर को ज़रा प्यार से पालो यारो लोग हाथों में लिए बैठे हैं अपने पिंजरे आज सैयाद को महफ़िल में बुला लो यारो आज सीवन को उधेड़ो तो ज़रा देखेंगे आज संदूक… Continue reading ये जो शहतीर है पलकों पे उठा लो यारो / दुष्यंत कुमार

तुम्हारे पाँव के नीचे कोई ज़मीन नहीं / दुष्यंत कुमार

तुम्हारे पाँव के नीचे कोई ज़मीन नहीं कमाल ये है कि फिर भी तुम्हें यक़ीन नहीं मैं बेपनाह अँधेरों को सुब्ह कैसे कहूँ मैं इन नज़ारों का अँधा तमाशबीन नहीं तेरी ज़ुबान है झूठी ज्म्हूरियत की तरह तू एक ज़लील-सी गाली से बेहतरीन नहीं तुम्हीं से प्यार जतायें तुम्हीं को खा जाएँ अदीब यों तो… Continue reading तुम्हारे पाँव के नीचे कोई ज़मीन नहीं / दुष्यंत कुमार

आग जलती रहे / दुष्यंत कुमार

एक तीखी आँच ने इस जन्म का हर पल छुआ, आता हुआ दिन छुआ हाथों से गुजरता कल छुआ हर बीज, अँकुआ, पेड़-पौधा, फूल-पत्ती, फल छुआ जो मुझे छूने चली हर उस हवा का आँचल छुआ … प्रहर कोई भी नहीं बीता अछूता आग के संपर्क से दिवस, मासों और वर्षों के कड़ाहों में मैं… Continue reading आग जलती रहे / दुष्यंत कुमार

ज़िंदगानी का कोई मक़सद नहीं है / दुष्यंत कुमार

ज़िंदगानी का कोई मक़सद नहीं है एक भी क़द आज आदमक़द नहीं है राम जाने किस जगह होंगे क़बूतर इस इमारत में कोई गुम्बद नहीं है आपसे मिल कर हमें अक्सर लगा है हुस्न में अब जज़्बा—ए—अमज़द नहीं है पेड़—पौधे हैं बहुत बौने तुम्हारे रास्तों में एक भी बरगद नहीं है मैकदे का रास्ता अब… Continue reading ज़िंदगानी का कोई मक़सद नहीं है / दुष्यंत कुमार

अफ़वाह है या सच है ये कोई नही बोला / दुष्यंत कुमार

अफ़वाह है या सच है ये कोई नही बोला मैंने भी सुना है अब जाएगा तेरा डोला इन राहों के पत्थर भी मानूस थे पाँवों से पर मैंने पुकारा तो कोई भी नहीं बोला लगता है ख़ुदाई में कुछ तेरा दख़ल भी है इस बार फ़िज़ाओं ने वो रंग नहीं घोला आख़िर तो अँधेरे की… Continue reading अफ़वाह है या सच है ये कोई नही बोला / दुष्यंत कुमार