Madhav Madhukar Archive

सोचेंगे कैसे आग पे पानी को छोड़कर / माधव मधुकर

सोचेंगे कैसे आग पे पानी को छोड़कर, हम देखते हैं चीज़ों को चीज़ों से जोड़कर । क्यों ज़िन्दगी का बाग़ न सरसब्ज़ हो सका, हमने तो दे दिया है लहू तक निचोड़कर । कैसा हुआ विकास कि जब आज भी …

ज़मीं को रख सकोगे यूँ बचाकर / माधव मधुकर

ज़मीं को रख सकोगे यूँ बचाकर, समुन्दर को नदी कर दो घटाकर । शरारे हैं, ये भड़केंगे यक़ीनन, कहाँ तक रख सकोगे तुम दबाकर । जो बातें अम्न की आए थे करने, गए वो जंग का जज़्बा जगाकर । लहू …

साँस क्यों रुकने लगी है / माधव मधुकर

आ गया है वक़्त अब ये देखने का आस की हर साँस क्यों रुकने लगी है ? बैठकर कुछ देर अपने साथ सोचें पीर क्यों हर आँख में दिखने लगी है ? ज़िन्दगी के सीप के मोती कहाँ हैं ? …