सति की महिमा / कबीर

साधु सती और सूरमा, इनका मता अगाध | आशा छाड़े देह की, तिनमें अधिका साध || सन्त, सती और शूर – इनका मत अगम्य है| ये तीनों शरीर की आशा छोड़ देते हैं, इनमें सन्त जन अधिक निश्चय वाले होते होते हैं | साधु सती और सूरमा, कबहु न फेरे पीठ | तीनों निकासी बाहुरे,… Continue reading सति की महिमा / कबीर

शब्द की महिमा / कबीर

शब्द दुरिया न दुरै, कहूँ जो ढोल बजाय | जो जन होवै जौहोरी, लेहैं सीस चढ़ाय || ढोल बजाकर कहता हूँ निर्णय – वचन किसी के छिपाने (निन्दा उपहास करने) से नहीं छिपते | जो विवेकी – पारखी होगा, वह निर्णय – वचनों को शिरोधार्य कर लेगा | एक शब्द सुख खानि है, एक शब्द… Continue reading शब्द की महिमा / कबीर

उपदेश की महिमा / कबीर

काल काल तत्काल है, बुरा न करिये कोय | अन्बोवे लुनता नहीं, बोवे तुनता होय || काल का विकराल गाल तुमको तत्काल ही निगलना चाहता है, इसीलिए किसी प्रकार भी बुराई न करो | जो नहीं बोया गया है, वह काटने को नहीं मिलता, बोया ही कटा जाता है | या दुनिया में आय के,… Continue reading उपदेश की महिमा / कबीर

काल की महिमा / कबीर

कबीर टुक टुक चोंगता, पल पल गयी बिहाय | जिन जंजाले पड़ि रहा, दियरा यमामा आय || ऐ जीव ! तू क्या टुकुर टुकुर देखता है ? पल पल बीताता जाता है, जीव जंजाल में ही पड़ रहा है, इतने में मौत ने आकर कूच का नगाड़ा बजा दिया | जो उगै सो आथवै, फूले… Continue reading काल की महिमा / कबीर

व्यवहार की महिमा / कबीर

कबीर गर्ब न कीजिये, इस जीवन की आस | टेसू फूला दिवस दस, खंखर भया पलास || कबीर जी कहते हैं कि इस जवानी कि आशा में पड़कर मद न करो | दस दिनों में फूलो से पलाश लद जाता है, फिर फूल झड़ जाने पर वह उखड़ जाता है, वैसे ही जवानी को समझो… Continue reading व्यवहार की महिमा / कबीर

भक्ति की महिमा / कबीर

भक्ति बीज पलटै नहीं, जो जुग जाय अनन्त | ऊँच नीच घर अवतरै, होय सन्त का सन्त || की हुई भक्ति के बीज निष्फल नहीं होते चाहे अनंतो युग बीत जाये | भक्तिमान जीव सन्त का सन्त ही रहता है चाहे वह ऊँच – नीच माने गये किसी भी वर्ण – जाती में जन्म ले… Continue reading भक्ति की महिमा / कबीर

सुख-दुःख की महिमा / कबीर

सुख – दुःख सिर ऊपर सहै, कबहु न छाडै संग | रंग न लागै और का, व्यापै सतगुरु रंग || सभी सुख – दुःख अपने सिर ऊपर सह ले, सतगुरु – सन्तो की संगर कभी न छोड़े | किसी ओर विषये या कुसंगति में मन न लगने दे, सतगुरु के चरणों में या उनके ज्ञान… Continue reading सुख-दुःख की महिमा / कबीर

सेवक की महिमा / कबीर

सवेक – स्वामी एक मत, मत में मत मिली जाय | चतुराई रीझै नहीं, रीझै मन के भाय || सवेक और स्वामी की पारस्परिक मत मिलकर एक सिद्धांत होना चहिये | चालाकी करने से सच्चे स्वामी नहीं प्रसन्न होते, बल्कि उनके प्रसन्न होने का कारण हार्दिक भक्ति – भाव होता है | सतगुरु शब्द उलंघ… Continue reading सेवक की महिमा / कबीर

संगति की महिमा / कबीर

कबीर संगत साधु की, नित प्रति कीजै जाय | दुरमति दूर बहावासी, देशी सुमति बताय || गुरु कबीर जी कहते हैं कि प्रतिदिन जाकर संतों की संगत करो | इससे तुम्हारी दुबुद्धि दूर हो जायेगी और सन्त सुबुद्धि बतला देंगे | कबीर संगत साधु की, जौ की भूसी खाय | खीर खांड़ भोजन मिलै, साकत… Continue reading संगति की महिमा / कबीर

सद्आचरण की महिमा / कबीर

माँगन गै सो मर रहै, मरै जु माँगन जाहिं | तिनते पहिले वे मरे, होत करत हैं नहिं || जो किसी के यहाँ मांगने गया, जानो वह मर गया | उससे पहले वो मरगया जिसने होते हुए मना कर दिया | अजहूँ तेरा सब मिटै, जो मानै गुरु सीख | जब लग तू घर में… Continue reading सद्आचरण की महिमा / कबीर