राग गौड़ी / पृष्ठ – ७ / पद / कबीर

पढ़ि ले काजी बंग निवाजा, एक मसीति दसौं दरवाजा॥टेक॥ मन करि मका कबिला करि देही, बोलनहार जगत गुर येही॥ उहाँ न दोजग भिस्त मुकाँमाँ, इहाँ ही राँम इहाँ रहिमाँनाँ॥ बिसमल ताँमस भरम कै दूरी, पंचूँ भयि ज्यूँ होइ सबूरी॥ कहै कबीर मैं भया दीवाँनाँ, मनवाँ मुसि मुसि सहजि समानाँ॥61॥ टिप्पणी: ख-मन करि मका कबिला कर… Continue reading राग गौड़ी / पृष्ठ – ७ / पद / कबीर

राग गौड़ी / पृष्ठ – ६ / पद / कबीर

लोका जानि न भूलौ भाई। खालिक खलक खलक मैं खालिक, सब घट रहौ समाई ॥टेक॥ अला एकै नूर उपनाया, ताकी कैसी निंदा। ता नूर थै सब जग कीया, कौन भला कौन मंदा ॥ ता अला की गति नहीं जाँनी गुरि गुड़ दीया मीठा ॥ कहै कबीर मैं पूरा पाया, सब घटि साहिब दीठा ॥51॥ राँम… Continue reading राग गौड़ी / पृष्ठ – ६ / पद / कबीर

राग गौड़ी / पृष्ठ – ५ / पद / कबीर

जौ पै करता बरण बिचारै, तौ जनमत तीनि डाँड़ि किन सारै॥टेक॥ उतपति ब्यंद कहाँ थैं आया, जो धरी अरु लागी माया। नहीं को ऊँचा नहीं को नीचा, जाका प्यंड ताही का सींचा। जे तूँ बाँभन बभनी जाया, तो आँन वाँट ह्नै काहे न आया। जे तूँ तुरक तुरकनी जाया, तो भीतरि खतनाँ क्यूँ न कराया।… Continue reading राग गौड़ी / पृष्ठ – ५ / पद / कबीर

राग गौड़ी / पृष्ठ – ४ / पद / कबीर

मैं डोरै डारे जाऊँगा, तौ मैं बहुरि न भौजलि आऊँगा॥टेक॥ सूत बहुत कुछ थोरा, ताथै, लाइ ले कंथा डोरा। कंथा डोरा लागा, तथ जुरा मरण भौ भागा॥ जहाँ सूत कपास न पूनी, तहाँ बसै इक मूनी। उस मूनीं सूँ चित लाऊँगा, तो मैं बहुरि न भौजलि आऊँगा॥ मेरे डंड इक छाजा, तहाँ बसै इक राजा।… Continue reading राग गौड़ी / पृष्ठ – ४ / पद / कबीर

राग गौड़ी / पृष्ठ – ३ / पद / कबीर

तननाँ बुनना तज्या कबीर, राम नाम लिखि लिया शरीर॥टेक॥ जब लग भरौं नली का बेह, तब लग टूटै राम सनेह॥ ठाड़ी रोवै कबीर की माइ, ए लरिका क्यूँ जीवै खुदाइ। कहै कबीर सुनहुँ री माई, पूरणहारा त्रिभुवन राइ॥21॥ जुगिया न्याइ मरै मरि जाइ। धर जाजरौ बलीडौ टेढ़ौ, औलोती डर राइ॥टेक॥ मगरी तजौ प्रीति पाषे सूँ… Continue reading राग गौड़ी / पृष्ठ – ३ / पद / कबीर

राग गौड़ी / पृष्ठ – २ / पद / कबीर

एक अचंभा देखा रे भाई, ठाढ़ा सिंध चरावै गाई॥टेक॥ पहले पूत पीछे भइ माँई, चेला कै गुरु लागै पाई। जल की मछली तरवर ब्याई, पकरि बिलाई मुरगै खाई॥ बैलहि डारि गूँनि घरि आई, कुत्ता कूँ लै गई बिलाई॥ तलिकर साषा ऊपरि करि मूल बहुत भाँति जड़ लगे फूल। कहै कबीर या पद को बूझै, ताँकूँ… Continue reading राग गौड़ी / पृष्ठ – २ / पद / कबीर

राग गौड़ी / पृष्ठ – १ / पद / कबीर

दुलहनी गावहु मंगलचार, हम घरि आए हो राजा राम भरतार॥टेक॥ तन रत करि मैं मन रत करिहूँ, पंचतत्त बराती। राम देव मोरैं पाँहुनैं आये मैं जोबन मैं माती॥ सरीर सरोवर बेदी करिहूँ, ब्रह्मा वेद उचार। रामदेव सँगि भाँवरी लैहूँ, धनि धनि भाग हमार॥ सुर तेतीसूँ कौतिग आये, मुनिवर सहस अठ्यासी। कहै कबीर हँम ब्याहि चले… Continue reading राग गौड़ी / पृष्ठ – १ / पद / कबीर

अबिहड़ कौ अंग / साखी / कबीर

कबीर साथी सो किया, जाके सुख दुख नहीं कोइ। हिलि मिलि ह्नै करि खेलिस्यूँ कदे बिछोह न होइ॥1॥ कबीर सिरजनहार बिन, मेरा हितू न कोइ। गुण औगुण बिहड़ै नहीं, स्वारथ बंधी लोइ॥2॥ आदि मधि अरु अंत लौं, अबिहड़ सदा अभंग। कबीर उस करता की, सेवग तजै न संग॥3॥809॥

बेलि कौ अंग / साखी / कबीर

अब तौ ऐसी ह्नै पड़ी, नाँ तूँ बड़ी न बेलि। जालण आँणीं लाकड़ी, ऊठी कूँपल मेल्हि॥1॥ आगै आगै दौं जलैं, पीछै हरिया होइ। बलिहारी ता विरष की, जड़ काट्याँ फल होइ॥2॥ टिप्पणी: ख-दौं बलै। जे काटौ तो डहडही, सींचौं तौ कुमिलाइ। इस गुणवंती बेलि का, कुछ गुँण कहाँ न जाइ॥3॥ आँगणि बेलि अकासि फल, अण… Continue reading बेलि कौ अंग / साखी / कबीर

साषीभूत कौ अंग / साखी / कबीर

कबीर पूछै राँम कूँ, सकल भवनपति राइ। सबही करि अलगा रहौ, सो विधि हमहिं बताइ॥1॥ जिहि बरियाँ साईं मिलै, तास न जाँणै और। सब कूँ सुख दे सबद करि, अपणीं अपणीं ठौर॥2॥ कबीर मन का बाहुला, ऊँचा बहै असोस। देखत ही दह मैं पड़े, दई किसा कौं दोस॥3॥800॥