हरि को नाम न लेइ गँवारा, क्या सोंचे बारंबारा॥टेक॥ पंच चोर गढ़ मंझा, गड़ लूटै दिवस रे संझा॥ जौ गढ़पति मुहकम होई, तौ लूटि न सकै कोई॥ अँधियारै दीपक चहिए, तब बस्त अगोचर लहिये॥ जब बस्त अगोचर पाई, तब दीपक रह्या समाई॥ जौ दरसन देख्या चाहिये, तौ दरपन मंजत रहिये॥ जब दरपन लागै कोई, तब… Continue reading राग सोरठि / पृष्ठ – १ / पद / कबीर
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राग आसावरी / पृष्ठ – ६ / पद / कबीर
चेतनि देखै रे जग धंधा, राम नाम का मरम न जाँनैं, माया कै रसि अंधा॥टेक॥ जतमत हीरू कहा ले आयो, मरत कहा ले जासी। जैसे तरवर बसत पँखेरू, दिवस चारि के बासी॥ आपा थापि अवर कौ निंदै, जन्मत हो जड़ काटी। हरि को भगति बिना यहु देही, धब लौटैे ही फाटी॥ काँम क्रोध मोह मद… Continue reading राग आसावरी / पृष्ठ – ६ / पद / कबीर
राग आसावरी / पृष्ठ – ५ / पद / कबीर
मेरी मेरी करताँ जनम गयौ, जनम गयौ पर हरि न कह्यौ॥टेक॥ बारह बरस बालापन खोयौ, बीस बरस कछु तप न कयौ। तीन बरस कै राम न सुमिरौं, फिरि पछितानौं बिरध भयो॥ आयौ चोर तुरंग मुसि ले गयौ, मोरी राखत मगध फिरै॥ सीस चरन कर कंपन लागै, नैन नीर अस राल बहै। जिभ्या बचन सूध नहीं… Continue reading राग आसावरी / पृष्ठ – ५ / पद / कबीर
राग आसावरी / पृष्ठ – ४ / पद / कबीर
मन कै मैलौ बाहरि ऊजलौ किसी रे, खाँडे की धार जन कौ धरम इसी रे॥टेक॥ हिरदा कौ बिलाव नैन बगध्यानी, ऐसी भगति न होइ रे प्रानी॥ कपट की भगति करै जिन कोई, अंत की बेर बहुत दुख होई॥ छाँड़ि कपट भजौ राम राई, कहै कबीर तिहुँ लोक बड़ाई॥233॥ चौखौ वनज ब्यौपार, आइनै दिसावरि रे राम… Continue reading राग आसावरी / पृष्ठ – ४ / पद / कबीर
राग आसावरी / पृष्ठ – ३ / पद / कबीर
ता भै थैं मन लागौ राम तोही, करौ कृपा जिनि बिसरौ मोहीं॥टैक॥ जननी जठर सह्या दुख भारी, सो संक्या नहीं गई हमारी॥ दिन दिन तन छीजै जरा जनावै, केस गहे काल बिरदंग बजावै॥ कहै कबीर करुणामय आगैं, तुम्हारी क्रिपा बिना यहु बिपति न भागै॥223॥ कब देखूँ मेरे राम सनेही, जा बिन दुख पावै मेरी देही॥टेक॥… Continue reading राग आसावरी / पृष्ठ – ३ / पद / कबीर
राग आसावरी / पृष्ठ – २ / पद / कबीर
धरी मेरे मनवाँ तोहि धरि टाँगौं, तै तौ कीयौ मेरे खसम सूँ षाँगी॥टेक॥ प्रेम की जेवरिया तेरे गलि बाँधूँ, तहाँ लै जाँउँ जहाँ मेरौ माधौ। काया नगरीं पैसि किया मैं बासा, हरि रस छाड़ि बिषै रसि माता॥ कहै कबीर तन मन का ओरा भाव भकति हरिसूँ गठजोरा॥213॥ परब्रह्म देख्या हो तत बाड़ी फूली, फल लागा… Continue reading राग आसावरी / पृष्ठ – २ / पद / कबीर
राग आसावरी / पृष्ठ – १ / पद / कबीर
ऐसा रे अवधू की वाणी, ऊपरि कूवटा तलि भरि पाँणीं॥टेक॥ जब लग गगन जोति नहीं पलटै, अबिनासा सुँ चित नहीं विहुटै। जब लग भँवर गुफा नहीं जानैं, तौ मेरा मन कैसै मानैं॥ जब लग त्रिकुटी संधि न जानैं, ससिहर कै घरि सूर न आनैं। जब लग नाभि कवल नहीं सोधै, तौ हीरै हीरा कैसै बेधैं॥… Continue reading राग आसावरी / पृष्ठ – १ / पद / कबीर
राग रामकली / पृष्ठ – ५ / पद / कबीर
बाजैं जंत्रा बजावै गुँनी, राम नाँम बिन भूली दुनीं॥टेक॥ रजगुन सतगुन तमगुन तीन, पंच तत से साजया बींन॥ तीनि लोक पूरा पेखनाँ, नाँच नचावै एकै जनाँ। कहै कबीर संसा करि दूरि, त्रिभवननाथ रह्या भरपूरि॥194॥ जंत्री जंत्रा अनूपन बाजै, ताकौ सबद गगन मैं गाजै॥टेक॥ सुर की नालि सुरति का तूँबा, सतगुर साज बनाया। सुर नर गण… Continue reading राग रामकली / पृष्ठ – ५ / पद / कबीर
राग रामकली / पृष्ठ – ४ / पद / कबीर
तेरा जन एक आध है कोई। काम क्रोध अरु लोभ बिंबर्जित, हरिपद चीन्हैं सोई॥टेक॥ राजस ताँमस सातिग तीन्यूँ, ये सब मेरी माया। चौथे पद कौं जे जन चीन्हैं, तिनहिं परम पद पाया॥ असतुति निंद्या आसा छाँड़ै, तजै माँन अभिमानाँ। लोहा कंचन समि करि देखै, ते मूरति भगवानाँ॥ च्यंतै तौ माधौ च्यंतामणि, हरिपद रमैं उदासा। त्रिस्ना… Continue reading राग रामकली / पृष्ठ – ४ / पद / कबीर
राग रामकली / पृष्ठ – ३ / पद / कबीर
अवधू अगनि जरै कै काठ। पूछौ पंडित जोग संन्यासी, सतगुर चीन्है बाट॥टेक॥ अगनि पवन मैं पवन कबन मैं, सबद गगन के पवाँन। निराकार प्रभु आदि निरंजन, कत रवंते भवनाँ॥ उतपति जाति कवन अँधियारा, धन बादल का बरिषा। प्रगट्यो बीच धरनि अति अधिकै, पारब्रह्म नहीं देखा॥ मरनाँ मरै न मरि सकै, मरनाँ दूरि न नेरा। द्वादश… Continue reading राग रामकली / पृष्ठ – ३ / पद / कबीर