क्या ह्नै तेरे न्हाई धाँई, आतम रांम न चीन्हा सोंई॥टेक॥ क्या घट उपरि मंजन कीयै, भीतरि मैल अपारा॥ राम नाम बिन नरक न छूटै, जे धोवै सौ बारा॥ का नट भेष भगवां बस्तर, भसम लगावै लोई। ज्यूँ दादुर सुरसरी जल भीतरि हरि बिन मुकति न होई॥ परिहरि काम राम कहि बौरे सुनि सिख बंधू मोरी।… Continue reading राग भैरूँ / पृष्ठ – ३ / पद / कबीर
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राग भैरूँ / पृष्ठ – २ / पद / कबीर
राम निरंजन न्यारा रे, अंजन सकल पसारा रे॥टेक॥ अंजन उतपति वो उंकार, अंजन मांड्या सब बिस्तार। अंजन ब्रह्मा शंकर ईद, अंजन गोपी संगि गोब्यंद॥ अंजन बाणी अंजन बेद, अंजन कीया नांनां भेद। अंजन विद्या पाठ पुरांन, अंजन फोकट कथाहिं गियांन॥ अंजन पाती अंजन देव, अंजन की करै अंजन सेव॥ अंजन नाचै अंजन गावै, अंजन भेष… Continue reading राग भैरूँ / पृष्ठ – २ / पद / कबीर
राग भैरूँ / पृष्ठ – १ / पद / कबीर
ऐसा ध्यान धरौ नरहरी सबद अनाहद च्यंत करी॥टेक॥ पहलो खोजौ पंचे बाइ, बाइ ब्यंद ले गगन समाइ। गगन जोति तहाँ त्रिकुटी संधि, रबि ससि पवनां मेलौ बंधि॥ मन थिर होइ न कवल प्रकासै, कवला माँहि निरंजन बासै। सतगुरु संपट खोलि दिखावै, निगुरा होइ तो कहाँ बतावै। सहज लछिन ले तजो उपाधि, आसण दिढ निद्रा पुनि… Continue reading राग भैरूँ / पृष्ठ – १ / पद / कबीर
राग टोड़ी / पद / कबीर
तू पाक परमानंदे। पीर पैकबर पनहु तुम्हारी, मैं गरीब क्या गंदे॥टेक॥ तुम्ह दरिया सबही दिल भीतरि, परमानंद पियारे। नैक नजरि हम ऊपरि नांहि, क्या कमिबखत हमारे॥ हिकमति करै हलाल बिचारै, आप कहांवै मोटे। चाकरी चोर निवाले हाजिर, सांई सेती खोटे॥ दांइम दूवा करद बजावै, मैं क्या करूँ भिखारी। कहै कबीर मैं बंदा तेरा, खालिक पनह… Continue reading राग टोड़ी / पद / कबीर
राग मारू / पद / कबीर
मन रे राम सुमिरि राम सुमिरि राम सुमिरि भाई। राम नाम सुमिरन बिनै, बूड़त है अधिकाई॥टेक॥ दारा सुत गेह नेह, संपति अधिकाई॥ यामैं कछु नांहि तेरौ, काल अवधि आई॥ अजामेल गज गनिका, पतित करम कीन्हाँ॥ तेऊ उतरि पारि गये, राम नाम लीन्हाँ॥ स्वांन सूकर काग कीन्हौ, तऊ लाज न आई॥ राम नाम अंमृत छाड़ि काहे… Continue reading राग मारू / पद / कबीर
राग केदारौ / पृष्ठ – २ / पद / कबीर
चलत कत टेढौं टेढौं रे। नउँ दुवार नरक धरि मूँदे, तू दुरगंधि को बैढी रे॥ जे जारे तौ होई भसमतन, तामे कहाँ भलाई॥ सूकर स्वाँन काग कौ भखिन, रहित किरम जल खाई। फूटे नैन हिरदै नाहीं सूझै, मति एकै नहीं जाँनी॥ माया मोह ममिता सूँ बाँध्यो, बूडि मूवो बिन पाँनी॥ बारू के घरवा मैं बैठी,… Continue reading राग केदारौ / पृष्ठ – २ / पद / कबीर
राग केदारौ / पृष्ठ – १ / पद / कबीर
सार सुख पाइये रे, रंगि रमहु आत्माँराँम॥टेक॥ बनह बसे का कीजिये, जे मन नहीं तजै बिकार। घर बन तत समि जिनि किया ते बिरला संसार॥ का जटा भसम लेपन किये, कहा गुफा मैं बास। मन जीत्या जग जीतिये, जौ बिषया रहै उदास॥ सहज भाइ जे ऊपजै, ताका किसा माँन अभिमान। आपा पर समि चीनियैं, तब… Continue reading राग केदारौ / पृष्ठ – १ / पद / कबीर
राग सोरठि / पृष्ठ – ४ / पद / कबीर
मन रे आइर कहाँ गयौ, ताथैं मोहि वैराग भयौ॥टेक॥ पंच तत ले काया कीन्हीं, तत कहा ले कीन्हाँ। करमौं के बसि जीव कहत है, जीव करम किनि दीन्हाँ॥ आकास गगन पाताल गगन दसौं दिसा गगन रहाई ले। आँनँद मूल सदा परसोतम, घट बिनसै गगन न जाई ले॥ हरि मैं तन हैं तन मैं हरि है,… Continue reading राग सोरठि / पृष्ठ – ४ / पद / कबीर
राग सोरठि / पृष्ठ – ३ / पद / कबीर
अब मैं पायौ राजा राम सनेही॥टेक॥ जा बिनु दुख पावै मेरी देही॥टेक॥ वेद पुरान कहत जाकी साखी, तीरथि ब्रति न छूटै जंम की पासी॥ जाथैं जनम लहत नर आगैं, पाप पुंनि दोऊ भ्रम लागै॥ कहै कबीर सोई तत जागा, मन भया मगन प्रेम रस लागा॥283॥ बिरहिनी फिरै है नाम अधीरा, उपजि बिनाँ कछू समझि न… Continue reading राग सोरठि / पृष्ठ – ३ / पद / कबीर
राग सोरठि / पृष्ठ – २ / पद / कबीर
इब न रहूँ माटी के घर मैं, इब मैं जाइ रहूँ मिलि हरि मैं॥टेक॥ छिनहर घर अरु झिरहर टाटी, धन गरजत कंपै मेरी छाती॥ दसवैं द्वारि लागि गई तारी, दूरि गवन आवन भयौ भारी॥ चहुँ दिसि बैठे चारि पहरिया, जागत मुसि नये मोर नगरिया॥ कहै कबीर सुनहु रे लोई, भाँनड़ घड़ण सँवारण सोई॥273॥ कबीर बिगर्या… Continue reading राग सोरठि / पृष्ठ – २ / पद / कबीर