कबीर जेते पाप किये राखे तलै दुराइ। परगट भये निदान सब पूछै धर्मराइ॥61॥ जैसी उपजी पेड़ ते जो तैसी निबहै ओड़ि। हीरा किसका बापुरा पुजहिं न रतन करोड़ि॥62॥ जो मैं चितवौ ना करै क्या मेरे चितवे होइ। अपना चितव्या हरि करैं जो मारै चित न होइ॥63॥ जोर किया सो जुलुम है लेइ जवाब खुदाइ। दफतर… Continue reading परिशिष्ट-4 / कबीर
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परिशिष्ट-3 / कबीर
कबीर गरबु न कीजियै देही देखि सुरंग। आजु कालि तजि जाहुगे ज्यों कांचुरी भुअंग॥41॥ गहगंच परौं कुटुंब के कंठै रहि गयो राम। आइ परे धर्म राइ के बीचहिं धूमा धाम॥42॥ कबीर गागर जल भरी आजु कालि जैहै फूटि। गुरु जु न चेतहि आपुनो अधमाझली जाहिगे लूटि॥43॥ गुरु लागा तब जानिये मिटै मोह तन ताप। हरष… Continue reading परिशिष्ट-3 / कबीर
परिशिष्ट-2 / कबीर
कबीर कस्तूरी भया भवर भये सब दास। ज्यों ज्यों भगति कबीर की त्यों त्यों राम निवास॥21॥ कागद केरी ओबरी मसु के कर्म कपाट। पाहन बोरी पिरथमी पंडित थाड़ी बाट॥22॥ काम परे हरि सिमिरिये ऐसा सिमरो चित। अमरपुरा बांसा करहु हरि गया बहोरै बित्त॥23॥ काया कजली बन भया मन कुंजर मयमंतु। अंक सुज्ञान रतन्न है खेवट… Continue reading परिशिष्ट-2 / कबीर
परिशिष्ट-1 / कबीर
आठ जाम चौंसठि घरी तुअ निरखत रहै जीव। नीचे लोइन क्यों करौ सब घट देखौ पीउ॥1॥ ऊँच भवन कनक कामिनी सिखरि धजा फहराइ। ताते भली मधूकरी संत संग गुन गाइ॥2॥ अंबर घनहरू छाइया बरिष भरे सर ताल। चातक ज्यों तरसत रहै, तिनकौ कौन हवाल॥3॥ अल्लह की कर बंदगी जिह सिमरत दुख जाइ। दिल महि साँई… Continue reading परिशिष्ट-1 / कबीर
चौपदी / रमैणी / कबीर
ऊंकार आदि है मूला, राजा परजा एकहिं सूला। हम तुम्ह मां हैं एकै लोहू, एकै प्रान जीवन है मोहू॥ एकही बास रहै दस मासा, सूतग पातग एकै आसा॥ एकहीं जननीं जान्यां संसारा, कौन ग्यान थैं भये निनारा॥ ग्यांन न पायो बावरे, धरी अविद्या मैड। सतगुर मिल्या न मुक्ति फल ताथैं खाई बैड॥ बालक ह्नै भग… Continue reading चौपदी / रमैणी / कबीर
बारहपदी / रमैणी / कबीर
पहली मन में सुमिरौ सोई, ता सम तुलि अवर नहीं कोई॥ कोई न पूजै बाँसूँ प्रांनां, आदि अंति वो किनहूँ न जाँनाँ॥ रूप सरूप न आवै बोला, हरू गरू कछू जाइ न तोला॥ भूख न त्रिषां धूप नहीं छांही, सुख दुख रहित रहै सब मांही॥ अविगत अपरंपार ब्रह्म, ग्याँन रूप सब ठाँम॥॥ बहु बिचारि करि… Continue reading बारहपदी / रमैणी / कबीर
अष्टपदी / रमैणी / कबीर
केऊ केऊ तीरथ ब्रत लपटानां, केऊ केऊ केवल राम निज जाना॥ अजरा अमर एक अस्थाना, ताका मरम काहू बिरलै जानां॥ अबरन जोति सकल उजियारा, द्रिष्टि समांन दास निस्तारा॥ जो नहीं उपज्या धरनि सरीरा, ताकै पथि न सींच्या नीरा॥ जा नहीं लागे सूरजि के बांनां, सो मोहि आंनि देहु को दाना॥ जब नहीं होते पवन नहीं… Continue reading अष्टपदी / रमैणी / कबीर
दुपदी / रमैणी / कबीर
भरा दयाल बिषहर जरि जागा, गहगहान प्रेम बहु लगा॥ भया अनंद जीव भये उल्हासा, मिले राम मनि पूगी आसा॥ मास असाढ़ रबि धरनि जरावै, जरत जरत जल आइ बुझावै॥ रूति सुभाइ जिमीं सब जागी, अंमृत धार होइ झर लागी॥ जिमीं मांहि उठी हरियाई, बिरहनि पीव मिले जन जाई॥ मनिकां मनि के भये उछाहा, कारनि कौन… Continue reading दुपदी / रमैणी / कबीर
बड़ी अष्टपदी / रमैणी / कबीर
एक बिनाँनी रच्या बिनांन, सब अयांन जो आपै जांन॥ सत रज तम थें कीन्हीं माया, चारि खानि बिस्तार उपाया॥ पंच तत ले कीन्ह बंधानं, पाप पुंनि मांन अभिमानं॥ अहंकार कीन्हें माया मोहू, संपति बिपति दीन्हीं सब काहू॥ भले रे पोच अकुल कुलवंता, गुणी निरगुणी धन नीधनवंता॥ भूख पियास अनहित हित कीन्हो, हेत मोर तोर करि… Continue reading बड़ी अष्टपदी / रमैणी / कबीर
सतपदी / रमैणी / कबीर
कहन सुनन कौ जिहि जग कीन्हा, जग भुलाँन सो किनहुँ न चीन्हा॥ सत रज तम थें कीन्हीं माया, आपण माझै आप छिपाया॥ तुरक सरीअत जनिये, हिंदू बेद पुरान॥ मन समझन कै कारनै, कछु एक पढ़िये ज्ञान॥ जहाँ बोल तहाँ आखिर आवा, जहाँ अबोल तहाँ मन न लगावा॥ बोल अबोल मंझि है सोई, जे कुछि है… Continue reading सतपदी / रमैणी / कबीर