गर्भ बास महि कुल नहिं जाती। ब्रह्म बिंद ते सब उतपाती॥ कहु रे पंडित बामन कब क होये। बामन कहि कहि जनम मति खोये॥ जौ तू ब्राह्मण ब्राह्मणी जाया। तौ आन बाट काहे नहीं आया॥ तुम कत ब्राह्मण हम कत शूद। हम कत लोहू तुम कत दूध॥ कहु कबीर जो ब्रह्म बिचारै। सो ब्राह्मण कहियत… Continue reading परिशिष्ट-14 / कबीर
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परिशिष्ट-13 / कबीर
काया कलालनि लादनि मेलै गुरु का सबद गुड़ कीनु रे। त्रिस्ना काल क्रोध मद मत्सर काटि काटि कसु दीन रे॥ कोई हेरै संत सहज सुख अंतरि जाको जप तप देउ दलाली रे॥ एक बूँद भरि तन मन देवो जोमद देइ कलाली रे॥ भुवन चतुरदस भाठी कीनी ब्रह्म अगिन तन जारी रे॥ मुद्रा मदक सहज धुनि… Continue reading परिशिष्ट-13 / कबीर
परिशिष्ट-12 / कबीर
इन माया जगदीस गुसाई तुमरे चरन बिसारे॥ किंचत प्रीति न उपजै जन को जन कहा करे बेचारे॥ धृग तन धृग धन धृगं इह माया धृग धृग मति बुधि फन्नी॥ इस माया कौ दृढ़ करि राखहु बाँधे आप बचन्नी॥ क्या खेती क्या लेवा देवा परपंच झूठ गुमाना॥ कहि कबीर ते अंत बिगूते आया काल निदाना॥21॥ इसु… Continue reading परिशिष्ट-12 / कबीर
परिशिष्ट-11 / कबीर
अंतरि मैल जे तीरथ न्हावै तिसु बैकुंठ न जाना। लोक पतीणे कछू न होवै नाहीं राम अयाना। पूजहू राम एकु ही देवा साचा नावण गुरु की सेवा। जल के मज्जन जे गति होवै नित नित मेडुक न्हावहि॥ जैसे मेडुक तैसे ओइ नर फिरि फिरि जोनी आवहि। मनहु कठोर मरै बनारस नरक न बांच्या जाई। हरि… Continue reading परिशिष्ट-11 / कबीर
परिशिष्ट-10 / कबीर
जहँ अनभै तहँ भौ नहीं जहँ भै तहं हरि नाहिं। कह्यौ कबीर बिचारिकै संत सुनहु मन माँहि॥181॥ जोरी किये जुलुम है कहता नाउ हलाल। दफतर लेखा माडिये तब होइगौ कौन हवाल॥182॥ ढूँढत डोले अंध गति अरु चीनत नाहीं अंत। कहि नामा क्यों पाइयै बिन भगतई भगवंत॥183॥ नीचे लोइन कर रहौ जे साजन घट माँहि। सब… Continue reading परिशिष्ट-10 / कबीर
परिशिष्ट-9 / कबीर
कबीर सूख न एह जुग करहि जु बहुतैं मीत। जो चित राखहि एक स्यों ते सुख पावहिं नीत॥161॥ कबीर सूरज चाद्दद कै उरय भई सब देह। गुरु गोबिंद के बिन मिले पलटि भई सब खेह॥162॥ कबीर सोई कुल भलो जा कुल हरि को दासु। जिह कुल दासु न ऊपजे सो कुल ढाकु पलासु॥163॥ कबीर सोई… Continue reading परिशिष्ट-9 / कबीर
परिशिष्ट-8 / कबीर
कबीर संगत साध की दिन दिन दूना हेतु। साकत कारी कांबरी धोए होइ न सेतु॥141॥ संत की गैल न छांड़ियै मारगि लागा जाउ। पेखत ही पुन्नीत होइ भेटत जपियै नाउ॥142॥ संतन की झुरिया भली भठी कुसत्ती गाँउ। आगि लगै तिह धोलहरि जिह नाहीं हरि को नाँउ॥143॥ संत मुये क्या रोइयै जो अपने गृह जाय। रोवहु… Continue reading परिशिष्ट-8 / कबीर
परिशिष्ट-7 / कबीर
कबीर मेरी सिमरनी रसना ऊपरि रामु। आदि जगादि सगस भगत ताकौ सब बिश्राम॥121॥ जम का ठेगा बुरा है ओह नहिं सहिया जाइ। एक जु साधु मोहि मिलो तिन लीया अंचल लाइ॥122॥ कबीर यह चेतानी मत सह सारहि जाइ। पाछै भोग जु भोगवै तिनकी गुड़ लै खाइ॥123॥ रस को गाढ़ो चूसिये गुन को मरिये रोइ। अवमुन… Continue reading परिशिष्ट-7 / कबीर
परिशिष्ट-6 / कबीर
भाँग माछुली सुरापान जो जो प्रानी खाहि। तीरथ बरत नेम किये ते सबै रसातल जांहि॥101॥ भार पराई सिर धरै चलियो चाहै बाट। अपने भारहि ना डरै आगै औघट घाठ॥102॥ कबीर मन निर्मल भया जैसा गंगा नीर। पाछै लागो हरि फिरहिं कहत कबीर कबीर॥103॥ कबीर मन पंखी भयो उड़ि उड़ि दह दिसि जाइ। जो जैसी संगति… Continue reading परिशिष्ट-6 / कबीर
परिशिष्ट-5 / कबीर
देखि देखि जग ढूँढ़िया कहूँ न पाया ठौर। जिन हरि का नाम न चेतिया कहा भुलाने और॥81॥ कबीर धरती साध की तरकस बैसहि गाहि। धरती भार न ब्यापई उनकौ लाहू लाहि॥82॥ कबीर नयनी काठ की क्या दिखलावहि लोइ। हिरदै राम न चेतही इक नयनी क्या होइ॥83॥ जा घर साध न सोवियहि हरि की सेवा नांहि।… Continue reading परिशिष्ट-5 / कबीर