आचरण की महिमा / कबीर

चाल बकुल की चलत है, बहुरि कहावै हंस | ते मुक्ता कैसे चुगे, पड़े काल के फंस || जो बगुले के आचरण में चलकर, पुनः हंस कहलाते हैं वे ज्ञान – मोती कैसे चुगेगे ? वे तो कल्पना काल में पड़े हैं | बाना पहिरे सिंह का, चलै भेड़ की चाल | बोली बोले सियार… Continue reading आचरण की महिमा / कबीर

साधु-महिमा / कबीर

कबीर सोई दिन भला, जा दिन साधु मिलाय | अंक भरे भरि भेरिये, पाप शरीर जाय || वो दिन बहुत अच्छा है जिस दिन सन्त मिले | सन्तो से दिल खोलकर मिलो , मन के दोष दूर होंगे | दरशन कीजै साधु का, दिन में कइ कइ बार | आसोजा का भेह ज्यों, बहुत करे… Continue reading साधु-महिमा / कबीर

गुरु-महिमा / कबीर

गुरु सो ज्ञान जु लीजिये, सीस दीजये दान। बहुतक भोंदू बहि गये, सखि जीव अभिमान॥१॥ व्याख्या: अपने सिर की भेंट देकर गुरु से ज्ञान प्राप्त करो | परन्तु यह सीख न मानकर और तन, धनादि का अभिमान धारण कर कितने ही मूर्ख संसार से बह गये, गुरुपद – पोत में न लगे। गुरु की आज्ञा… Continue reading गुरु-महिमा / कबीर

परिशिष्ट-21 / कबीर

सनक सनंद महेस समाना। सेष नाग तेरी मर्म न जाना॥ संत संगति राम रिदै बसाई। हनुमान सरि गरुड़ समाना। सुरपति नरपति नहिं गुन जाना॥ चारि बेद अरु सिमृति पुराना। कमलापति कमल नहिं जाना॥ कह कबीर सो धरमैं नाहीं। पग लगि राम रहै सरनाहीं॥201॥ सब कोई चलन कहत है ऊँहा। ना जानी बैकुठ है कहाँ॥ आप… Continue reading परिशिष्ट-21 / कबीर

परिशिष्ट-20 / कबीर

रे जिय निलज्ज लाज तोहि नाहीं। हरि तजि कत काहू के जाही। जाको ठाकुर ऊँचा होई। सो जन पर घर जात न सोही॥ सो साहिब रहिया भरपूरि। सदा संगि नाहीं हरि दूरि॥ कवला चरन सरन है जाके। कहू जन का नाहीं घर ताके। सब कोउ कहै जासु की बाता। जी सम्भ्रथ निज पति है दाता॥… Continue reading परिशिष्ट-20 / कबीर

परिशिष्ट-19 / कबीर

माई मोहि अवरु न जान्यो आनाँ। सिव सनकादिक जासु गुन गावहि तासु बसहि मेरे प्रानाँ। हिरदै प्रगास ज्ञान गुरु गम्मित गगन मंडल महि ध्यानाँ॥ बिषय रोग भव बंधन भागे मन निज घर सुख जानाँ॥ एक सुमति रति जानि मानि प्रभु दूसर मनहि न आना। चंदन बास भये मन बास न त्यागि घट्यो अभिमानाँ॥ जो जन… Continue reading परिशिष्ट-19 / कबीर

परिशिष्ट-18 / कबीर

प्रहलाद पठाये पठन साल। संगि सखा बहु लिए बाल॥ मोकौ कहा पढ़ावसि आल जाल। मेरी पटिया लिखि देहु श्रीगोपाल॥ नहीं छोड़ौ रे बाबा राम नाम। मेरो और पढ़न स्यो नहीं काम॥ संडै मरकै कह्यौ जाइ। प्रहलाद बुलाये बेगि धाइ॥ तू राम कहन की छोडु बानि। तुझ तुरत छड़ाऊँ मेरो कह्यो मानि॥ मोकौ कहा सतावहु बार… Continue reading परिशिष्ट-18 / कबीर

परिशिष्ट-17 / कबीर

नगन फिरत जो पाइये जोग। बनका मिरग मुकति सब होग॥ क्या नागे क्या बांधे चाम। जब नहिं चीन्हसि आतम राम॥ मूँड़ मुडांए जो सि;ि पाई। मुक्ती भेड़ न गय्या काई॥ बिंदु राख जो तरयै भाई। खुसरै क्यों न परम गति पाई॥ कहु कबीर सुनहु नर भाई। राम नाम बिन किन गति पाई॥121॥ नर मरै नर… Continue reading परिशिष्ट-17 / कबीर

परिशिष्ट-16 / कबीर

ज्यों कपि के कर मुष्टि चरन की लुब्धि न त्यागि दयो। जो जो कर्म किये लालच स्यों ते फिर गरहि परो॥ भगति बिनु बिरथेे जनम गयो। साध संगति भगवान भजन बिन कही न सच्च रह्यो॥ ज्यों उद्यान कुसुम परफुल्लित किनहि न घ्राउ लयो॥ तैसे भ्रमत अनेक जोनि महि फिरि फिरि काल हयो॥ या धन जोबन… Continue reading परिशिष्ट-16 / कबीर

परिशिष्ट-15 / कबीर

जाके निगम दूध के ठाटा। समुद बिलोवन की माटा। ताकी होहु बिलोवनहारी। क्यों मिटैगी छाछि तुम्हारी॥ चेरी तू राम न करसि भरतारा। जग जीवन प्रान अधारा॥ तेरे गलहि तौक पग बेरी। तू घर घर रमिए फेरी॥ तू अजहु न चेतसि चेरी। तू जेम बपुरी है हेरी॥ प्रभु करन करावन हारी। क्या चेरी हाथ बिचारी॥ सोई… Continue reading परिशिष्ट-15 / कबीर