हम तुमसे क्या उम्मीद करते / अंशु मालवीय

हम तुमसे क्या उम्मीद करते …हम तुमसे क्या उम्मीद करते ब्राम्‍हण देव! तुमने तो खुद अपने शरीर के बाएं हिस्से को अछूत बना डाला बनाया पैरों को अछूत रंभाते रहे मां…मां और मां, और मातृत्व रस के रक्ताभ धब्बों को बना दिया अछूत हमारे चलने को कहा रेंगना भाषा को अछूत बना दिया छंद को,… Continue reading हम तुमसे क्या उम्मीद करते / अंशु मालवीय

वक्त / अंशु मालवीय

निजी जीवन का राजनैतिक रेखाचित्र इकहत्तर की लड़ाई के वक्त पैदा हुआ मैं स्कूल गया इमेरजेन्सी में, मस्जिद गिरने के साथ गया विश्वविद्यालय, नई आर्थिक नीति का साथ बाहर आ गया वहाँ से, फिलहाल बेरोज़गार हूँ और किसी बड़ी राजनीतिक घटना में रोज़गार तलाश रहा हूँ ।

बच्चा / अंशु मालवीय

कालीन कारख़ाने में बच्चे कालीन कारख़ाने में बच्चे, खाँस्ते हैं फेफड़े को चीरते हुए उनके नन्हें गुलाबी फेफड़े गैस के गुब्बारों से थे, उन्हें खुले आकाश में उड़ा देने को बेचैन – मौत की चिड़िया कारख़ानों में उड़ते रेशों से उनके उन्हीं फेफड़ों में घोंसला बना रही है । ज़रा सोचो जो तुम्हारे खलनायकीय तलुओं… Continue reading बच्चा / अंशु मालवीय

दोस्त / अंशु मालवीय

आश्वसित मुँह से क्या कहूँ, मेरा तो पूरा वजूद तेरे लिये शुभकामना है मेरे दोस्त ! तुझे क्या बताऊँ कि बिना दोस्त के नास्तिक नहीं हुआ जा सकता – समाज में असुरक्षा है बहुत, आदमी के डर ने बनाया है ईश्वर और उसके साहस ने बनाई है दोस्ती तुझसे क्या क़रार लूँ, तेरा पूरा वजूद ही… Continue reading दोस्त / अंशु मालवीय

हिंदू राष्ट्र के शहीदों के प्रति / अंशु मालवीय

जहाँ जली वह ट्रेन उसके अगले स्टेशन पर हिंदू राष्ट्र था। जैसे विश्व विजय थी कारगिल के उस पार हालांकि अभी मंज़ूर नहीं थी अमेरिका को वैसे ही जैसे अमेरिका और अम्बानी दोनों को मंज़ूर नहीं था फिलहाल हिंदू राष्ट्र जले दुधमुंहे बच्चे अभी जिन्हें हिंदू बनाया जाना था जली वे औरतें जो धरम के… Continue reading हिंदू राष्ट्र के शहीदों के प्रति / अंशु मालवीय

निजी जीवन का राजनैतिक रेखाचित्र / अंशु मालवीय

इकहत्तर की लड़ाई के वक्त पैदा हुआ में स्कूल गया इमरजेंसी में, मस्जिद गिरने के साथ गया विश्वविद्यालय नई आर्थिक नीति के साथ बाहर आ गया वहां से, फिलहाल बेरोजगार हूँ और किसी बड़ी राजनीतिक घटना में रोज़गार तलाश रहा हूँ।

मैं बहुत खुश थी अम्मा! / अंशु मालवीय

सब कुछ ठीक था अम्मा ! तेरे खाए अचार की खटास तेरी चखी हुई मिट्टी अक्सर पहुँचते थे मेरे पास…! सूरज तेरी कोख से छनकर मुझ तक आता था। मैं बहुत खुश थी अम्मा ! मुझे लेनी थी जल्दी ही अपने हिस्से की साँस मुझे लगनी थी अपने हिस्से की भूख मुझे देखनी थी अपने हिस्से की… Continue reading मैं बहुत खुश थी अम्मा! / अंशु मालवीय

हम मांस के थरथराते झंडे हें / अंशु मालवीय

मणिपुर-जुलाई 2004, सेना ने मनोरमा नाम की महिला के साथ बलात्कार के बाद उसकी हत्या कर दी। मनोरमा के लिए न्याय की मांग करती महिलाओं ने निर्वस्त्र हो प्रदर्शन किया। उस प्रदर्शन की हिस्सेदारी के लिए यह कविता देखो हमें हम मांस के थरथराते झंडे हैं देखो बीच चौराहे पर बरहना हैं हमारी वही छातियाँ… Continue reading हम मांस के थरथराते झंडे हें / अंशु मालवीय

वैष्‍णव जन / अंशु मालवीय

वैष्णव जन आखेट पर निकले हैं! उनके एक हाथ में मोबाइल है दूसरे में देशी कट्टा तीसरे में बम और चौथे में है दुश्‍मनों की लिस्‍ट. वैष्‍णव जन आखेट पर निकले हैं! वे अरण्‍य में अनुशासन लाएंगे एक वर्दी में मार्च करते एक किस्म के पेड़ रहेंगे यहां. वैष्‍णव जन आखेट पर निकले हैं! वैष्‍णव… Continue reading वैष्‍णव जन / अंशु मालवीय

वास्‍तविक जीवन की भाषा / अंशु मालवीय

हम गांव अव‍धी बोलते थे पढ़ते हिन्‍दी में थे, शहर आए तो हिन्‍दी बोलने लगे और पढ़ने लगे अंग्रेज़ी में. रिश्ते-नाते दरद-दोस्त हिन्‍दी में कागज-पत्तर बाबू-दफ़्तर सब अंग्रेज़ी में; बड़ा फ़र्क हो गया हमारे वास्‍तविक जीवन की भाषा और बौद्धिक जीवन की भाषा में. वे प्रचार करते थे हिन्दी में हम वोट देते थे रोज़मर्रा… Continue reading वास्‍तविक जीवन की भाषा / अंशु मालवीय