Harish Nigam Archive

बादल लिखना / हरीश निगम

मेहंदी-सुर्खी काजल लिखना महका-महका आँचल लिखना! धूप-धूप रिश्तों के जंगल ख़त्म नहीं होते हैं मरुथल जलते मन पर बादल लिखना! इंतज़ार के बिखरे काँटे काँटे नहीं कटे सन्नाटे वंशी लिखना मादल लिखना!

दुख नदी भर / हरीश निगम

सुख अंजुरि-भर दुख नदी-भर जी रहे दिन-रात सीकर! ढही भीती उड़ी छानी मेह सूखे आँख पानी फड़फड़ाते मोर-तीतर! हैं हवा के होंठ दरके फटे रिश्ते गाँव-घर के एक मरुथल उगा भीतर! आक हो- आए करौंदे आस के टूटे घरौंदे घेरकर …