Harichand Akhtar Archive

सैर-ए-दुनिया से ग़रज़ थी महव-ए-दुनिया कर दिया / हरी चंद अख़्तर

सैर-ए-दुनिया से ग़रज़ थी महव-ए-दुनिया कर दिया मैं ने क्या चाहा मिरे अल्लाह ने क्या कर दिया रोकने वाला न था कोई ख़ुदा को इस लिए जो कुछ आया उस के जी में बे-मुहाबा कर दिया हाँ उसी कम-बख़्त दिल …

जिस ज़मीं पर तिरा नक़्श-ए-कफ़-ए-पा होता है / हरी चंद अख़्तर

जिस ज़मीं पर तिरा नक़्श-ए-कफ़-ए-पा होता है एक इक ज़र्रा वहाँ क़िबला नुमा होता है काश वो दिल पे रक्खे हाथ और इतना पूछे क्यूँ तड़प उठता है क्या बात है क्या होता है बज़्म-ए-दुश्मन है ख़ुदा के लिए आराम …