Harbinder Singh Gill Archive

धुँआ (2) / हरबिन्दर सिंह गिल

कैसे हो जाए, चारों तरफ जमघट विधवाओं का । कैसे बन जाए, हंसते-खेलते शहर, ढेर एक राख का । हो यह कैसे भी, पर होगा जरूर । क्योंकि, ये बादल बनें हैं एक धुऐं के जो उठते हैं, मनुष्य के …

धुँआ (1) / हरबिन्दर सिंह गिल

ये कैसे बादल हैं जो बिन मौसम के हैं, ये आसमान में नहीं रहते रहते हैं, गली कूचों में । इन बादलों से सूरज की रोशनी कम नहीं होती न रोकते हैं, चाँदनी चांद की । क्योंकि, ये गरजते नहीं …