hans Archive

हंस कहाँ मिलिहैं अब तो बर / हंस

हंस कहाँ मिलिहैं अब तो बर भक्ति के भाव वे पूरब वारे । तीरथ मे छहरात न शांति सदाँ घहरात हैँ लोभ नगारे । मँदिर के दृढ़ जाल तनाय तहाँ बहु ब्याध पुजारी निहारे । फाँसत कामिनी कंचन की चिरियाँ …