Gyan Prakash Choubey Archive

नदी बोलेगी / ज्ञान प्रकाश चौबे

मेरी चुप्पी नदी की चुप्पी नहीं है जंगलों में पेड़ों की तादाद धूप की गर्मी से कम है मेरे हिस्से की हवा माँ के बुने स्वेटर की साँस से कम है बादल छुपे हैं यहीं कहीं सेमल के पीछे मेरे …

प्रेम को बचाते हुए / ज्ञान प्रकाश चौबे

मैंने उसे एक चिट्ठी लिखी जिसमें नम मिट्टी के साथ मखमली घास थी घास पर एक टिड्डा बैठा था पूरी हरियाली को अपने में समेटे हुए जाड़े की चटकीली धूप से लिखा उसमें तुम्हें भूला नही हूँ तुम्हारा चेहरा बादलों …