बादलों से सलाम लेता हूँ वक्त क़े हाथ थाम लेता हूँ सारा मैख़ाना झूम उठता है जब मैं हाथों में जाम लेता हूँ ख़ुशी जिस ने खोजी वो धन ले के लौटा हँसी जिस ने खोजी चमन ले के लौटा मगर प्यार को खोजने जो गया वो न तन ले के लौटा न मन ले… Continue reading मुक्तक / गोपालदास “नीरज”
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अब तो मज़हब कोई ऐसा भी चलाया जाए / गोपालदास “नीरज”
अब तो मज़हब कोई ऐसा भी चलाया जाए। जिसमें इंसान को इंसान बनाया जाए। जिसकी ख़ुशबू से महक जाय पड़ोसी का भी घर फूल इस क़िस्म का हर सिम्त खिलाया जाए। आग बहती है यहाँ गंगा में झेलम में भी कोई बतलाए कहाँ जाके नहाया जाए। प्यार का ख़ून हुआ क्यों ये समझने के लिए… Continue reading अब तो मज़हब कोई ऐसा भी चलाया जाए / गोपालदास “नीरज”
जितना कम सामान रहेगा / गोपालदास “नीरज”
जितना कम सामान रहेगा उतना सफ़र आसान रहेगा जितनी भारी गठरी होगी उतना तू हैरान रहेगा उससे मिलना नामुमक़िन है जब तक ख़ुद का ध्यान रहेगा हाथ मिलें और दिल न मिलें ऐसे में नुक़सान रहेगा जब तक मन्दिर और मस्जिद हैं मुश्क़िल में इन्सान रहेगा ‘नीरज’ तो कल यहाँ न होगा उसका गीत-विधान रहेगा
तमाम उम्र मैं इक अजनबी के घर में रहा / गोपालदास “नीरज”
तमाम उम्र मैं इक अजनबी के घर में रहा । सफ़र न करते हुए भी किसी सफ़र में रहा । वो जिस्म ही था जो भटका किया ज़माने में, हृदय तो मेरा हमेशा तेरी डगर में रहा । तू ढूँढ़ता था जिसे जा के बृज के गोकुल में, वो श्याम तो किसी मीरा की चश्मे-तर… Continue reading तमाम उम्र मैं इक अजनबी के घर में रहा / गोपालदास “नीरज”
गगन बजाने लगा जल-तरंग फिर यारों / गोपालदास “नीरज”
गगन बजाने लगा जल-तरंग फिर यारों, कि भीगें हम भी ज़रा संग-संग फिर यारों. यह रिमझिमाती निशा और ये थिरकता सावन, है याद आने लगा इक प्रसंग फिर यारों. किसे पता है कि कबतक रहेगा ये मौसम, रख है बाँध के क्यूँ मन-कुरंग फिर यारों. घुमड़-घुमड़ के जो बादल घिरा अटारी पर, विहंग बन के… Continue reading गगन बजाने लगा जल-तरंग फिर यारों / गोपालदास “नीरज”
जब चले जाएँगे हम लौट के सावन की तरह / गोपालदास “नीरज”
जब चले जाएँगे हम लौट के सावन की तरह याद आयेंगे प्रथम प्यार के चुम्बन की तरह. ज़िक्र जिस दम भी छिड़ा उनकी गली में मेरा, जाने शरमाए वो क्यूँ गाँव की दुल्हन की तरह. मेरे घर कोई ख़ुशी आती तो कैसे आती? उम्र-भर साथ रहा दर्द महाजन की तरह. कोई कंघी न मिली जिससे… Continue reading जब चले जाएँगे हम लौट के सावन की तरह / गोपालदास “नीरज”
खुशबू सी आ रही है इधर ज़ाफ़रान की / गोपालदास “नीरज”
खुशबू सी आ रही है इधर ज़ाफ़रान की, खिडकी खुली है गालिबन उनके मकान की. हारे हुए परिन्दे ज़रा उड़ के देख तो, आ जायेगी जमीन पे छत आसमान की. बुझ जाये सरे आम ही जैसे कोई चिराग, कुछ यूँ है शुरुआत मेरी दास्तान की. ज्यों लूट ले कहार ही दुल्हन की पालकी, हालत यही… Continue reading खुशबू सी आ रही है इधर ज़ाफ़रान की / गोपालदास “नीरज”
अब के सावन में ये शरारत मेरे साथ हुई / गोपालदास “नीरज”
अब के सावन में ये शरारत मेरे साथ हुई, मेरा घर छोड़ के कुल शहर में बरसात हुई. आप मत पूछिए क्या हम पे सफ़र में गुजरी? था लुटेरों का जहाँ गाँव वहीं रात हुई. ज़िंदगी-भर तो हुई गुफ़्तगू गैरों से मगर, आज तक हमसे न हमारी मुलाक़ात हुई. हर गलत मोड़ पे टोका है… Continue reading अब के सावन में ये शरारत मेरे साथ हुई / गोपालदास “नीरज”
जूड़े घटाओं के / गोपालदास “नीरज”
दिन गए बीत शर्मीली हवाओं के, दूर तक दिखते नहीं जूड़ें घटाओं के झाँकता खिड़की न कोई, हर किवाड़ा बंद, पी गया सुनसान सारा रूप सब मरकन्द, रह गए हैं हाथ बस कुछ ख़त गुनाहों के. दूर तक दिखते नहीं जूड़ें घटाओं के. सिर्फ रस ही रस बरसती थी जहाँ बरसात, स्वर्ग से कुछ कम… Continue reading जूड़े घटाओं के / गोपालदास “नीरज”
सारा जग बंजारा होता / गोपालदास “नीरज”
प्यार अगर थामता न पथ में उँगली इस बीमार उमर की हर पीड़ा वैश्या बन जाती, हर आँसू आवारा होता। निरवंशी रहता उजियाला गोद न भरती किसी किरन की, और ज़िन्दगी लगती जैसे- डोली कोई बिना दुल्हन की, दुख से सब बस्ती कराहती, लपटों में हर फूल झुलसता करुणा ने जाकर नफ़रत का आँगन गर… Continue reading सारा जग बंजारा होता / गोपालदास “नीरज”