चिंता / भाग २ / कामायनी / जयशंकर प्रसाद

सुरा सुरभिमय बदन अरुण, वे नयन भरे आलस अनुराग़। कल कपोल था जहाँ बिछलता, कल्पवृक्ष का पीत पराग। विकल वासना के प्रतिनिधि, वे सब मुरझाये चले गये। आह जले अपनी ज्वाला से, फिर वे जल में गले, गये। अरी उपेक्षा-भरी अमरते, री अतृप्ति निबार्ध विलास। द्विधा-रहित अपलक नयनों की, भूख-भरी दर्शन की प्यास। बिछुड़े तेरे… Continue reading चिंता / भाग २ / कामायनी / जयशंकर प्रसाद

चिंता / भाग १ / कामायनी / जयशंकर प्रसाद

हिमगिरि के उत्तुंग शिखर पर, बैठ शिला की शीतल छाँह एक पुरुष, भीगे नयनों से, देख रहा था प्रलय प्रवाह। नीचे जल था ऊपर हिम था, एक तरल था एक सघन, एक तत्व की ही प्रधानता, कहो उसे जड़ या चेतन। दूर दूर तक विस्तृत था हिम, स्तब्ध उसी के हृदय समान, नीरवता-सी शिला-चरण से,… Continue reading चिंता / भाग १ / कामायनी / जयशंकर प्रसाद

हम बच्चे हैं तो क्या? / गोपालदास “नीरज”

हम बच्चे हैं तो क्या? हम हिंदोस्तान बदलकर छोड़ेंगे! इंसान है क्या, हम दुनिया का भगवान बदलकर छोड़ेंगे! मुश्किलें हमारी दासी हैं, आँधी-तूफान खिलौने हैं, भूचाल हमारे बिगुल, बर्फ से ढके पहाड़ बिछौने हैं! हम नई क्रांति के दूत, पुराने गान बदलकर छोड़ेंगे! हम देख रहे हैं भूख उग रही है गलियों-बाजारों में, है कैद… Continue reading हम बच्चे हैं तो क्या? / गोपालदास “नीरज”

फ़ूलों के रंग से / गोपालदास “नीरज”

फूलो के रंग से, दिल की कलम से तुझको लिखी रोज पाती. . कैसे बताऊँ किस-किस तरह से पल-पल मुझे तू सताती. . तेरे ही सपने ले कर के सोया. . तेरी ही यादो मे जागा. तेरे खयालो मे उलझा रहा यूं जैसे कि माला मे धागा. . बादल बिजली चंदन पानी जैसा अपना प्यार.… Continue reading फ़ूलों के रंग से / गोपालदास “नीरज”

खिलते हैं गुल यहाँ / गोपालदास “नीरज”

खिलते हैं गुल यहाँ, खिलके बिखरने को मिलते हैं दिल यहाँ, मिलके बिछड़ने को खिलते हैं गुल यहाँ… कल रहे ना रहे, मौसम ये प्यार का कल रुके न रुके, डोला बहार का चार पल मिले जो आज, प्यार में गुज़ार दे खिलते हैं गुल यहाँ… झीलों के होंठों पर, मेघों का राग है फूलों… Continue reading खिलते हैं गुल यहाँ / गोपालदास “नीरज”

मेघा छाए आधी रात / गोपालदास “नीरज”

मेघा छाए आधी रात, बैरन बन गई निंदिया बता दे मैं क्या करूँ मेघा छाए आधी रात, बैरन बन गई निंदिया सब के आंगन दिया जले रे, मोरे आंगन जिया हवा लागे शूल जैसी, ताना मारे चुनरिया कैसे कहूँ मैं मन की बात, बैरन बन गयीं निंदिया बता दे मैं क्या करूँ मेघा छाए आधी… Continue reading मेघा छाए आधी रात / गोपालदास “नीरज”

जीवन की बगिया महकेगी / गोपालदास “नीरज”

जीवन की बगिया महकेगी, लहकेगी, चहकेगी खुशियों की कलियाँ झूमेंगी, झूलेंगी, फूलेंगी जीवन की बगिया… वो मेरा होगा, वो सपना तेरा होगा मिलजुल के माँगा, वो तेरा मेरा होगा जब जब वो मुस्कुराएगा, अपना सवेरा होगा… थोड़ा हमारा थोड़ा तुम्हारा, आयेगा फिर से बचपन हमारा जीवन की बगिया… हम और बंधेंगे, हम तुम कुछ और… Continue reading जीवन की बगिया महकेगी / गोपालदास “नीरज”

दिल आज शायर है / गोपालदास “नीरज”

दिल आज शायर है, ग़म आज नग़मा है शब ये ग़ज़ल है सनम गैरों के शेरों को ओ सुनने वाले हो इस तरफ़ भी करम आके ज़रा देख तो तेरी खातिर हम किस तरह से जिये आँसू के धागे से सीते रहे हम जो ज़ख्म तूने दिये चाहत की महफ़िल में ग़म तेरा लेकर क़िस्मत… Continue reading दिल आज शायर है / गोपालदास “नीरज”

ऐ भाई! जरा देख के चलो / गोपालदास “नीरज”

ऐ भाई! जरा देख के चलो, आगे ही नहीं पीछे भी दायें ही नहीं बायें भी, ऊपर ही नहीं नीचे भी ऐ भाई! तू जहाँ आया है वो तेरा- घर नहीं, गाँव नहीं गली नहीं, कूचा नहीं, रस्ता नहीं, बस्ती नहीं दुनिया है, और प्यारे, दुनिया यह एक सरकस है और इस सरकस में- बड़े… Continue reading ऐ भाई! जरा देख के चलो / गोपालदास “नीरज”

लिखे जो खत तुझे / गोपालदास “नीरज”

लिखे जो ख़त तुझे वो तेरी याद में हज़ारों रंग के नज़ारे बन गए सवेरा जब हुआ तो फूल बन गए जो रात आई तो सितारे बन गए कोई नगमा कहीं गूँजा, कहा दिल ने के तू आई कहीं चटकी कली कोई, मैं ये समझा तू शरमाई कोई ख़ुशबू कहीं बिख़री, लगा ये ज़ुल्फ़ लहराई… Continue reading लिखे जो खत तुझे / गोपालदास “नीरज”