लज्जा / भाग २ / कामायनी / जयशंकर प्रसाद

“फूलों की कोमल पंखुडियाँ बिखरें जिसके अभिनंदन में। मकरंद मिलाती हों अपना स्वागत के कुंकुम चंदन में। कोमल किसलय मर्मर-रव-से जिसका जयघोष सुनाते हों। जिसमें दुख-सुख मिलकर मन के उत्सव आनंद मनाते हों। उज्ज्वल वरदान चेतना का सौंदर्य जिसे सब कहते हैं। जिसमें अनंत अभिलाषा के सपने सब जगते रहते हैं। मैं उसी चपल की… Continue reading लज्जा / भाग २ / कामायनी / जयशंकर प्रसाद

लज्जा / भाग १ / कामायनी / जयशंकर प्रसाद

“कोमल किसलय के अंचल में, नन्हीं कलिका ज्यों छिपती-सी। गोधूली के धूमिल पट में, दीपक के स्वर में दिपती-सी। मंजुल स्वप्नों की विस्मृति में, मन का उन्माद निखरता ज्यों। सुरभित लहरों की छाया में, बुल्ले का विभव बिखरता ज्यों। वैसी ही माया में लिपटी अधरों पर उँगली धरे हुए। माधव के सरस कुतूहल का आँखों… Continue reading लज्जा / भाग १ / कामायनी / जयशंकर प्रसाद

वासना / भाग २ / कामायनी / जयशंकर प्रसाद

“कालिमा धुलने लगी घुलने लगा आलोक। इसी निभृत अनंत में बसने लगा अब लोक। इस निशामुख की मनोहर सुधामय मुस्कान। देख कर सब भूल जायें दुःख के अनुमान। देख लो, ऊँचे शिखर का व्योम-चुबंन-व्यस्त। लौटना अंतिम किरण का और होना अस्त। चलो तो इस कौमुदी में देख आवें आज। प्रकृति का यह स्वप्न-शासन, साधना का… Continue reading वासना / भाग २ / कामायनी / जयशंकर प्रसाद

वासना / भाग १ / कामायनी / जयशंकर प्रसाद

चल पड़े कब से हृदय दो, पथिक-से अश्रांत। यहाँ मिलने के लिये, जो भटकते थे भ्रांत। एक गृहपति, दूसरा था अतिथि विगत-विकार। प्रश्न था यदि एक, तो उत्तर द्वितीय उदार। एक जीवन-सिंधु था, तो वह लहर लघु लोल। एक नवल प्रभात, तो वह स्वर्ण-किरण अमोल। एक था आकाश वर्षा का सजल उद्धाम। दूसरा रंजित किरण… Continue reading वासना / भाग १ / कामायनी / जयशंकर प्रसाद

काम / भाग २ / कामायनी / जयशंकर प्रसाद

जागरण-लोक था भूल चला, स्वप्नों का सुख-संचार हुआ। कौतुक सा बन मनु के मन का, वह सुंदर क्रीड़ागार हुआ। था व्यक्ति सोचता आलस में, चेतना सजग रहती दुहरी। कानों के कान खोल करके, सुनती थी कोई ध्वनि गहरी। “प्यासा हूँ, मैं अब भी प्यासा, संतुष्ट ओध से मैं न हुआ। आया फिर भी वह चला… Continue reading काम / भाग २ / कामायनी / जयशंकर प्रसाद

काम / भाग १ / कामायनी / जयशंकर प्रसाद

“मधुमय वसंत जीवन-वन के, बह अंतरिक्ष की लहरों में। कब आये थे तुम चुपके से, रजनी के पिछले पहरों में? क्या तुम्हें देखकर आते यों, मतवाली कोयल बोली थी? उस नीरवता में अलसाई, कलियों ने आँखे खोली थीं? जब लीला से तुम सीख रहे, कोरक-कोने में लुक करना। तब शिथिल सुरभि से धरणी में, बिछलन… Continue reading काम / भाग १ / कामायनी / जयशंकर प्रसाद

श्रद्धा / भाग २ / कामायनी / जयशंकर प्रसाद

“तपस्वी क्यों हो इतने क्लांत? वेदना का यह कैसा वेग? आह!तुम कितने अधिक हताश, बताओ यह कैसा उद्वेग? हृदय में क्या है नहीं अधीर, लालसा की निश्शेष? कर रहा वंचित कहीं न त्याग, तुम्हें,मन में धर सुंदर वेश। दुख के डर से तुम अज्ञात, जटिलताओं का कर अनुमान। काम से झिझक रहे हो आज़, भविष्य… Continue reading श्रद्धा / भाग २ / कामायनी / जयशंकर प्रसाद

श्रद्धा / भाग १ / कामायनी / जयशंकर प्रसाद

कौन हो तुम? संसृति-जलनिधि, तीर-तरंगों से फेंकी मणि एक। कर रहे निर्जन का चुपचाप, प्रभा की धारा से अभिषेक? मधुर विश्रांत और एकांत, जगत का सुलझा हुआ रहस्य, एक करुणामय सुंदर मौन, और चंचल मन का आलस्य। सुना यह मनु ने मधु गुंजार, मधुकरी का-सा जब सानंद। किये मुख नीचा कमल समान, प्रथम कवि का… Continue reading श्रद्धा / भाग १ / कामायनी / जयशंकर प्रसाद

आशा / भाग २ / कामायनी / जयशंकर प्रसाद

उठे स्वस्थ मनु ज्यों उठता है, क्षितिज बीच अरुणोदय कांत। लगे देखने लुब्ध नयन से, प्रकृति-विभूति मनोहर, शांत। पाकयज्ञ करना निश्चित कर, लगे शालियों को चुनने। उधर वह्नि-ज्वाला भी अपना, लगी धूम-पट थी बुनने। शुष्क डालियों से वृक्षों की, अग्नि-अर्चिया हुई समिद्ध। आहुति के नव धूमगंध से, नभ-कानन हो गया समृद्ध। और सोचकर अपने मन… Continue reading आशा / भाग २ / कामायनी / जयशंकर प्रसाद

आशा / भाग १ / कामायनी / जयशंकर प्रसाद

ऊषा सुनहले तीर बरसती, जयलक्ष्मी-सी उदित हुई। उधर पराजित काल रात्रि भी जल में अतंर्निहित हुई। वह विवर्ण मुख त्रस्त प्रकृति का, आज लगा हँसने फिर से। वर्षा बीती, हुआ सृष्टि में, शरद-विकास नये सिर से। नव कोमल आलोक बिखरता, हिम-संसृति पर भर अनुराग। सित सरोज पर क्रीड़ा करता, जैसे मधुमय पिंग पराग। धीरे-धीरे हिम-आच्छादन,… Continue reading आशा / भाग १ / कामायनी / जयशंकर प्रसाद