रास की मुरली अभी तक कर पाई न सिंगार रास की मुरली उठी पुकार। [१] गई सहसा किस रस से भींग वकुल-वन में कोकिल की तान? चाँदनी में उमड़ी सब ओर कहाँ के मद की मधुर उफान? गिरा चाहता भूमि पर इन्दु शिथिलवसना रजनी के संग; सिहरते पग सकता न सँभाल कुसुम-कलियों पर स्वयं अनंग!… Continue reading रास की मुरली / रामधारी सिंह “दिनकर”
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अगुरु-धूम / रामधारी सिंह “दिनकर”
अगुरु-धूम कल मुझे पूज कर चढ़ा गया अलि कौन अपरिचित हृदय-हार? मैं समझ न पाई गृढ़ भेद, भर गया अगुर का अन्धकार। [१] श्रुति को इतना भर याद, भिक्षु गुनगुना रहा था मर्म-गान, “आ रहा दूर से मैं निराश, तुम दे पाओगी तृप्ति-दान? यह प्रेम-बुद्ध के लिए भीख, चाहिए नहीं धन, रूप, देह, मैं याच… Continue reading अगुरु-धूम / रामधारी सिंह “दिनकर”
नारी / रामधारी सिंह “दिनकर”
नारी खिली भू पर जब से तुम नारि, कल्पना-सी विधि की अम्लान, रहे फिर तब से अनु-अनु देवि! लुब्ध भिक्षुक-से मेरे गान। तिमिर में ज्योति-कली को देख सुविकसित, वृन्तहीन, अनमोल; हुआ व्याकुल सारा संसार, किया चाहा माया का मोल। हो उठी प्रतिभा सजग, प्रदीप्त, तुम्हारी छवि ने मारा बाण; बोलने लगे स्वप्न निर्जीव , सिहरने… Continue reading नारी / रामधारी सिंह “दिनकर”
प्रीति / रामधारी सिंह “दिनकर”
[१] प्रीति न और्ण साँझ के घन सखि! पल-भर चमक बिखर जाते जो मना कनक-गोधूलि-लगन सखि! प्रीति नील, गंभीर गगन सखि! चूम रहा जो विनत धरणि को निज सुख में नित मूक-मगन सखि! [२] प्रीति न पूर्ण चन्द्र जगमग सखि! जो होता नित क्षीण, एक दिन विभा-सिक्त करके अग-जग सखि! दूज-कला यह लघु नभ-नग सखि!… Continue reading प्रीति / रामधारी सिंह “दिनकर”
बालिका से वधू / रामधारी सिंह “दिनकर”
माथे में सेंदूर पर छोटी दो बिंदी चमचम-सी, पपनी पर आँसू की बूँदें मोती-सी, शबनम-सी। लदी हुई कलियों में मादक टहनी एक नरम-सी, यौवन की विनती-सी भोली, गुमसुम खड़ी शरम-सी। पीला चीर, कोर में जिसके चकमक गोटा-जाली, चली पिया के गांव उमर के सोलह फूलों वाली। पी चुपके आनंद, उदासी भरे सजल चितवन में, आँसू… Continue reading बालिका से वधू / रामधारी सिंह “दिनकर”
गीत-अगीत / रामधारी सिंह “दिनकर”
गीत, अगीत, कौन सुंदर है? गाकर गीत विरह की तटिनी वेगवती बहती जाती है, दिल हलका कर लेने को उपलों से कुछ कहती जाती है। तट पर एक गुलाब सोचता, “देते स्वर यदि मुझे विधाता, अपने पतझर के सपनों का मैं भी जग को गीत सुनाता।” गा-गाकर बह रही निर्झरी, पाटल मूक खड़ा तट पर… Continue reading गीत-अगीत / रामधारी सिंह “दिनकर”
दाह की कोयल / रामधारी सिंह “दिनकर”
दाह की कोयल दाह के आकाश में पर खोल, कौन तुम बोली पिकी के बोल? १ दर्द में भीगी हुई-सी तान, होश में आता हुआ-सा गान; याद आई जीस्त की बरसात, फिर गई दृग में उजेली रात; काँपता उजली कली का वृन्त, फिर गया दृग में समग्र बसन्त। मुँद गईं पलकें, खुले जब कान, सज… Continue reading दाह की कोयल / रामधारी सिंह “दिनकर”
भ्रमरी / रामधारी सिंह “दिनकर”
भ्रमरी पी मेरी भ्रमरी, वसन्त में अन्तर मधु जी-भर पी ले; कुछ तो कवि की व्यथा सफल हो, जलूँ निरन्तर, तू जी ले। चूस-चूस मकरन्द हृदय का संगिनि? तू मधु-चक्र सजा, और किसे इतिहास कहेंगे ये लोचन गीले-गीले? लते? कहूँ क्या, सूखी डालों पर क्यों कोयल बोल रही? बतलाऊँ क्या, ओस यहाँ क्यो? क्यों मेरे… Continue reading भ्रमरी / रामधारी सिंह “दिनकर”
रसवन्ती (कविता) / रामधारी सिंह “दिनकर”
अरी ओ रसवन्ती सुकुमार ! लिये क्रीड़ा-वंशी दिन-रात पलातक शिशु-सा मैं अनजान, कर्म के कोलाहल से दूर फिरा गाता फूलों के गान। कोकिलों ने सिखलाया कभी माधवी-कु़ञ्नों का मधु राग, कण्ठ में आ बैठी अज्ञात कभी बाड़व की दाहक आग। पत्तियों फूलों की सुकुमार गयीं हीरे-से दिल को चीर, कभी कलिकाओं के मुख देख अचानक… Continue reading रसवन्ती (कविता) / रामधारी सिंह “दिनकर”
वैभव की समाधि पर / रामधारी सिंह “दिनकर”
हँस उठी कनक-प्रान्तर में जिस दिन फूलों की रानी, तृण पर मैं तुहिन-कणों की पढ़ता था करुण कहानी। थी बाट पूछती कोयल ऋतुपति के कुसुम-नगर की, कोई सुधि दिला रहा था तब कलियों को पतझर की। प्रिय से लिपटी सोई थी तू भूल सकल सुधि तन की, तब मौत साँस में गिनती थी घडियाँ मधु-जीवन… Continue reading वैभव की समाधि पर / रामधारी सिंह “दिनकर”