इषिता के लिए (एक)/ अक्षय उपाध्याय

ओ मेरी बच्ची
मेरी आत्मा
तुम कैसे बड़ी हो‍ओगी !

तुम ऐसे बड़ी होना जैसे घास बड़ी होती है
तुम ऐसे बढ़ना जैसे लता बढ़ा करती है
तुम्हारे लिए यहाँ देखने को बहुत कुछ होगा
तुम्हारे लिए यहाँ खाने को बहुत कुछ होगा

तुम्हारे स्वप्नों को सुन रहा हूँ
तुम्हारे भीतर चल रही बातचीत समझ रहा हूँ
तुम्हारे भीतर असंख्य वसंत करवट ले रहे हैं

तुम्हारे आने के पहले यहाँ बहुत कुछ घट गया
एक दूकान लूट ली गई
एक बच्चे की हत्या कर दी गई
एक आज़ादी और मिली
एक मंत्री विदेश चला गया
एक युवती ने अपने प्रेम को सही किया
एक लम्बा जुलूस अपनी माँग के साथ आगे निकल गया
मैंने एक बेहद छोटी कविता लिखने की भूमिका बाँधी

मेरी बच्ची तुम बग़ीचे की तरह भली और भोली हो

यह अजनबी जगह नहीं है
हम तुम्हारे माँ-बाप
दोस्तों से भरी यह जगह
वर्षों हमने इसे तुम्हारे लिए ही लीप कर रखा है
इससे पहले भी तुम यहाँ अपनी
किलकारियों के साथ हमारे बीच रही हो

कितनी बार तुमने हमारे बीच अपना बेहद कच्चा
संगीत छेड़ा है
कितनी बार अपनी तुतलाती आवज़ में
दुनिया का सबसे ख़ूबसूरत गीत गाया है

पहली बार हमारे रक्त ने धरती का ऋण अदा किया
पृथ्वी को जीवित और सुन्दर बनाए रखने के लिए
एक भोली माँ दी है।

मेरी बच्ची
तुम्हारी सारी टूटी गुड़ियों को
वापस ले आऊँगा
और बाज़ार के दिन
तुम्हारे खोए नूपूर को ख़रीद कर
फिर से तुम्हें दूँगा

सारे दिन हवा साँय-साँय करती हुई
गाएगी ।

आदमी के इस जंगल में
सारे दिन हवा चिल्लाती है
प्रेम-प्रेम

मेरी नन्ही गुड़िया
तुम उत्सव के समान हो

एक लड़की जब बड़ी होती है तो
पूरी पृथ्वी के लिए
बड़ी होती है
मेरी बच्ची
मैम एक पूरी पृथ्वी
तुम्हें दहेज में दूँगा।

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