इश्क़ सुनते थे जिसे हम वो यही है शायद/ अल्ताफ़ हुसैन हाली

इश्क़ सुनते थे जिसे हम वो यही है शायद
ख़ुद-ब-ख़ुद, दिल में है इक शख़्स समाया जाता

शब को ज़ाहिद से न मुठभेड़ हुई ख़ूब हुआ
नश्अ ज़ोरों पे था शायद न छुपाया जाता

लोग क्यों शेख़ को कहते हैं कि अय्यार है वो
उसकी सूरत से तो ऐसा नहीं पाया जाता

अब तो [ithoughts_tooltip_glossary-tooltip content=”कुफ़्र का फ़तवा देने की आदत से , जाति बहिष्कृत करने की मनोवृत्ति से”]तफ़क़ीर[/ithoughts_tooltip_glossary-tooltip] , से [ithoughts_tooltip_glossary-tooltip content=”उपदेशक”]वाइज़[/ithoughts_tooltip_glossary-tooltip] ,  ! नहीं हटता ‘हाली’
कहते पहले तो दे-ले के हटाया जाता

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