आह्वान / महादेवी वर्मा

फूलों का गीला सौरभ पी
बेसुध सा हो मन्द समीर,
भेद रहे हों नैश तिमिर को
मेघों के बूँदों के तीर।
नीलम-मन्दिर की हीरक—
प्रतिमा सी हो चपला निस्पन्द,
सजल इन्दुमणि से जुगनू
बरसाते हों छबि का मकरन्द।
बुदबुद को लड़ियों में गूंथा
फैला श्यामल केश-कलाप,
सेतु बांधती हो सरिता सुन—
सुन चकवी का मूक विलाप।
तब रहस्यमय चितवन से-
छू चौंका देना मेरे प्राण,
ज्यों असीम सागर करता है
भूले नाविक का आह्वान।

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