सुन्दर हे, सुन्दर / सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”

सुन्दर हे, सुन्दर ! दर्शन से जीवन पर बरसे अनिश्वर स्वर। परसे ज्यों प्राण, फूट पड़ा सहज गान, तान-सुरसरिता बही तुम्हारे मंगल-पद छू कर। उठी है तरंग, बहा जीवन निस्संग, चला तुमसे मिलन को खिलने को फिर फिर भर भर। (1939)

उन चरणों में मुझे दो शरण / सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”

उन चरणों में मुझे दो शरण। इस जीवन को करो हे मरण। बोलूँ अल्प, न करूँ जल्पना, सत्य रहे, मिट जाय कल्पना, मोह-निशा की स्नेह-गोद पर सोये मेरा भरा जागरण। आगे-पीछे दायें-बायें जो आये थे वे हट जायें उठे सृष्टि से दृष्टि, सहज मैं करूँ लोक-आलोक-सन्तरण। (1939)

जन-जन के जीवन के सुन्दर / सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”

जन-जन के जीवन के सुन्दर हे चरणों पर भाव-वरण भर दूँ तन-मन-धन न्योछावर कर। दाग़-दग़ा की आग लगा दी तुमने जो जन-जन की, भड़की; करूँ आरती मैं जल-जल कर। गीत जगा जो गले लगा लो, हुआ ग़ैर जो, सहज सगा हो, करे पार जो है अति दुस्तर। (1939)

बादल छाये / सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”

बादल छाये, ये मेरे अपने सपने आँखों से निकले, मँडलाये। बूँदें जितनी चुनी अधखिली कलियाँ उतनी; बूँदों की लड़ियों के इतने हार तुम्हें मैंने पहनाये ! गरजे सावन के घन घिर घिर, नाचे मोर बनों में फिर फिर जितनी बार चढ़े मेरे भी तार छन्द से तरह तरह तिर, तुम्हें सुनाने को मैंने भी नहीं… Continue reading बादल छाये / सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”

नूपुर के सुर मन्द रहे / सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”

नूपुर के सुर मन्द रहे, जब न चरण स्वच्छन्द रहे। उतरी नभ से निर्मल राका, पहले जब तुमने हँस ताका बहुविध प्राणों को झंकृत कर बजे छन्द जो बन्द रहे। नयनों के ही साथ फिरे वे मेरे घेरे नहीं घिरे वे, तुमसे चल तुममें ही पहुँचे जितने रस आनन्द रहे। (1941)

कुकुरमुत्ता (कविता) / सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”

एक थे नव्वाब, फ़ारस से मंगाए थे गुलाब। बड़ी बाड़ी में लगाए देशी पौधे भी उगाए रखे माली, कई नौकर गजनवी का बाग मनहर लग रहा था। एक सपना जग रहा था सांस पर तहजबी की, गोद पर तरतीब की। क्यारियां सुन्दर बनी चमन में फैली घनी। फूलों के पौधे वहाँ लग रहे थे खुशनुमा।… Continue reading कुकुरमुत्ता (कविता) / सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”

प्रात तब द्वार पर / सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”

प्रात तव द्वार पर, आया, जननि, नैश अन्ध पथ पार कर । लगे जो उपल पद, हुए उत्पल ज्ञात, कंटक चुभे जागरण बने अवदात, स्मृति में रहा पार करता हुआ रात, अवसन्न भी हूँ प्रसन्न मैं प्राप्तवर– प्रात तव द्वार पर । समझा क्या वे सकेंगे भीरु मलिन-मन, निशाचर तेजहत रहे जो वन्य जन, धन्य… Continue reading प्रात तब द्वार पर / सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”

बुझे तृष्णाशा-विषानल / सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”

बुझे तृष्णाशा-विषानल झरे भाषा अमृत-निर्झर, उमड़ प्राणों से गहनतर छा गगन लें अवनि के स्वर । ओस के धोए अनामिल पुष्प ज्यों खिल किरण चूमे, गंध-मुख मकरंद-उर सानन्द पुर-पुर लोग घूमे, मिटे कर्षण से धरा के पतन जो होता भयंकर, उमड़ प्राणों से निरन्तर छा गगन लें अवनि के स्वर । बढ़े वह परिचय बिंधा… Continue reading बुझे तृष्णाशा-विषानल / सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”

टूटें सकल बंध / सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”

टूटें सकल बन्ध कलि के, दिशा-ज्ञान-गत हो बहे गन्ध। रुद्ध जो धार रे शिखर-निर्झर झरे मधुर कलरव भरे शून्य शत-शत रन्ध्र । रश्मि ऋजु खींच दे चित्र शत रंग के, वर्ण-जीवन फले, जागे तिमिर अन्ध ।

जग का एक देखा तार / सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”

जग का एक देखा तार । कंठ अगणित, देह सप्तक, मधुर-स्वर झंकार । बहु सुमन, बहुरंग, निर्मित एक सुन्दर हार; एक ही कर से गुँथा, उर एक शोभा-भार । गंध-शत अरविंद-नंदन विश्व-वंदन-सार, अखिल-उर-रंजन निरंजन एक अनिल उदार । सतत सत्य, अनादि निर्मल सकल सुख-विस्तार; अयुत अधरों में सुसिंचित एक किंचित प्यार । तत्त्व-नभ-तम में सकल-भ्रम-शेष,… Continue reading जग का एक देखा तार / सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”