हरिण नयन हरि ने छीने हैं / सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”

हरिण-नयन हरि ने छीने हैं। पावन रँग रग-रग भीने हैं। जिते न-चहती माया महती, बनी भावना सहती-सहती, भीतर धसी साधना बहती, सिले छेद जो तन सीने हैं। जाने जन जो मरे जिये थे, फिरे सुकृत जो लिये दिये थे, हुए हिये जो मान किये थे, पटे सुहसन, वसन झीने हैं।

कौन फिर तुझको बरेगा / सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”

कौन फिर तुझको बरेगा तू न जब उस पथ मरेगा? निखिल के शर शत्रु हनकर, क्षत भले कर क्षत्र बनकर, तू चला जबतक न तनकर,– धर्म का ध्वज कर न लेगा। देश के अवशेष के रण शमन के प्रहरण दिया तन तो हुआ तू शरणशारण, विश्व तेरे यश भरेगा। मिलेंगे जन अशंकित मन खिलेंगे निश्शेष-चेतन,… Continue reading कौन फिर तुझको बरेगा / सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”

तू दिगम्बर विश्व है घर / सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”

तू दिगम्बर विश्व है घर ज्ञान तेरा सहज वर कर। शोकसारण करणकारण, तरणतारण विष्णु-शंकर। अमित सित के असित चित क,े त्वरित हित के राम वानर, लक्षणासन संग लक्ष्मण वासनारण-प्रहर-खर-शर। गति अनाहत, तू सखा मत, सहज संयत, रे अकातर, ध्यान के सम्मान में रत ज्ञान के शतपथ-चराचर।

खोले अमलिन जिस दिन / सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”

खोले अमलिन जिस दिन, नयन विश्वजन के दिखी भारती की छबि, बिके लोग धन के। तन की छुटा गई सुरत, रुके चरण मायामत, रोग-शोक-लोक, वितत उठे नये रण के। तटिनी के तीर खड़े खम्भे थे, वीर बड़े, मेरु के करार चढ़े, श्रम के यौवन के।

तुम आये कनकाचल छाये / सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”

तुम आये, कनकाचल छाये, ऐ नव-नव किसलय फैलाये। शतशत वल्लरियाँ नत-मस्तक, झुककर पुष्पाधर मुसकाये। परिणय अगणन यौवन-उपवन, संकुल फल के गुंजन भाये; मधु के पावन सावन सरसे, परसे जीवन-वन मुरझाये। रवि-शशि-मण्डल, तारा-ग्रह-दल, फिरते पल-पल दृग-दृग छाये, मूर्छित गिरकर जो अनृत अकर, सुषमा के वर सर लहराये।

कैसे हुई हार तेरी निराकर, / सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”

कैसे हुई हार तेरी निराकार, गगन के तारकों बन्द हैं कुल द्वार? दुर्ग दुर्घर्ष यह तोड़ता है कौन? प्रश्न के पत्र, उत्तर प्रकृति है मौन; पवन इंगित कर रहा है–निकल पार। सलिल की ऊर्मियों हथेली मारकर सरिता तुझे कह रही है कि कारगर बिपत से वारकर जब पकड़ पतवार। क्षिति के चले सीत कहते विनतभाव–… Continue reading कैसे हुई हार तेरी निराकर, / सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”

गवना न करा। / सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”

गवना न करा। खाली पैरों रास्ता न चला। कंकरीली राहें न कटेंगी, बेपर की बातें न पटेंगी, काली मेघनियाँ न फटेंगी, ऐसे ऐसे तू डग न भरा। कुछ भी न बता तू रहा पता, सपने-सपने दे रहा घता, जो पूरा-पूरा माल-मता, मुरझा न जायगा बाग हरा।

मधुर स्वर तुमने बुलाया, / सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”

मधुर स्वर तुमने बुलाया, छद्म से जो मरण आया। बो गई विष वायु पच्छिम, मेघ के मद हुई रिमझिम, रागिनी में मृत्युः द्रिमद्रिम, तान में अवसान छाया। चरण की गति में विरत लय, सांस में अवकाश का क्षय, सुषमता में असम संचय, वरण में निश्शरण गाया।

उनसे-संसार, भव-वैभव-द्वार / सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”

उनसे-संसार, भव-वैभव-द्वार। समझो वर निर्जर रण; करो बार बार स्मरण, निराकार करण-हरण, शरण, मरणपार। रवि की छवि के प्रभात, ज्योति के अदृश्य गात, गन्ध-मन्द-पवन-जात, उर-उर के हार।

जननी मोह की रजनी / सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”

जननी मोह की रजनी पार कर गई अवनी। तोरण-तोरण साजे, मंगल-बाजे बाजे, जन-गण-जीवन राजे, महिलाएँ बनीठनीं। साड़ी के खिले मोर, रेशम के हिले छोर, शिंजित हैं बोर-बोर, चमकी है कनी-कनी। क्षिति पर हैं लौह-यान, गगन विकल हैं विमान, थल पर है उथल-पुथल, जल पर तैरी तरणी।