काम के छवि-धाम, शमन प्रशमन राम! सिन्धुरा के सीस सिन्दूर, जगदीश, मानव सहित-कीश, सीता-सती-नाम। अरि-दल-दलन-कारि, शंकर, समनुसारि पद-युगल-तट-वारि सरिता, सकल याम। शेष के तल्प कल शयन अवशेष-पल, चयन-कलि-गन्ध-दल विश्व के आराम।
श्याम-श्यामा के युगल पद / सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”
श्याम-श्यामा के युगल पद, कोकनद मन के विनिर्मद। हृदय के चन्दन सुखाशय, नयन के वन्दन निरामय, निश्शरण के निर्गमन के, गगन-छाया-तल सदाश्रय, उषा की लाली लगे दुख के, जगे के योग के गद। नन्द के आनन्द के घन, बाधना के साध्य-साधन, शेष के अवशेष के फल ज्योति के सम्वलित जीवन, प्राण के आदान के बल,… Continue reading श्याम-श्यामा के युगल पद / सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”
विपद-भय-निवारण करेगा वहीं सुन / सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”
विपद-भय-निवारण करेगा वही सुन, उसी का ज्ञान है, ध्यान है मान-गुन। वेग चल, वेग चल, आयु घटती हुई, प्रमुद-पद की सुखद वायु कटती हुई; जल्पना छोड़ दे जोड़ दे ललित धुन। सलिल में मीन हैं मग्न, मनु अनिल में सीखने के लिये ज्ञान है अखिल में, विमल अनवद्य की भावना सद्य चुन। अन्यथा सकल आराधना… Continue reading विपद-भय-निवारण करेगा वहीं सुन / सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”
चरण गहे थे, मौन रहे थे, / सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”
चरण गहे थे, मौन रहे थे, विनय-वचन बहु-रचन कहे थे। भक्ति-आंसुओं पद पखार कर, नयन-ज्योति आरति उतार कर, तन-मन-धन सर्वस्व वार कर, अमर-विचाराधार बहे थे। आस लगी है जी की जैसी, खण्डित हुई तपस्या वैसी, विरति सुरति में आई कैसी, कौन मान-उपमान लहे थे। ठोकर गली-गली की खाई, जगती से न कभी बन आई, रहे… Continue reading चरण गहे थे, मौन रहे थे, / सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”
पतित पावनी गंगे! / सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”
पतित पावनी, गंगे! निर्मल-जल-कल-रंगे! कनकाचल-विमल-धुली, शत-जनपद-प्रगद-खुली, मदन-मद न कभी तुली लता-वारि-भ्रू-भंगे! सुर-नर-मुनि-असुर-प्रसर स्तव रव-बहु गीत-विहर जल धारा धाराधर— मुखर, सुकर-कर-अंगे!
पतित हुआ हूँ भव से तार; / सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”
पतित हुआ हूँ भव से तार; दुस्तर दव से कर उद्धार। तू इंगित से विश्व अपरिमित रच-रचकर करती है अवसित किस काया से किस छायाश्रित, मैं बस होता हूँ बलिहार। समझ में न आया तेरा कर भर देगा या ले लेगा हर, सीस झुकाकर उन चरणों पर रहता हूँ भय से इस पार। रुक जाती… Continue reading पतित हुआ हूँ भव से तार; / सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”
साध पुरी, फिरी धुरी। / सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”
साध पुरी, फिरी धुरी। छुटी गैल-छैल-छुरी। अपने वश हैं सपने, सुकर बने जो न बने, सीधे हैं कड़े चने, मिली एक एक कुरी। सबकी आँखों उतरे साख-साख से सुथरे, सुए के हुए खुथरे ऊपर से चली खुरी। सजधजकर चले चले भले-भले गले-गले थे जो इकले-दुकले, बातें थीं भली-बुरी।
कनक कसौटी पर कढ़ आया / सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”
कनक कसौटी पर कढ़ आया स्वच्छ सलिल पर कर की छाया। मान गये जैसे सुनकर जन मन के मान अवश्रित प्रवचन, जो रणमद पद के उत्तोलन मिलते ही काया से काया। चले सुपथ सत्य को संवरकर उचित बचा लेने को टक्कर, तजने को जीवित अविनश्वर, मिलती जो माया से माया। वाद-विवाद गांठकर गहरे बायें सदा… Continue reading कनक कसौटी पर कढ़ आया / सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”
पथ पर बेमौत न मर / सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”
पथ पर बेमौत न मर, श्रम कर तू विश्रम-कर। उठा उठा करद हाथ, दे दे तू वरद साथ, जग के इस सजग प्रात पात-पात किरनें भर। बढ़ा बढ़ा कर के तन, जगा जगा निश्चेतन, भगा भीरु जीवन-रण सर-सर से उभर सुघर। चलते चलते छुटकर द्रुम की मधुलता उतर विधुर स्पर्श कर पथ पर युवा-युवतियों के… Continue reading पथ पर बेमौत न मर / सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”
हुए पार द्वार-द्वार / सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”
हुए पार द्वार-द्वार, कहीं मिला नहीं तार। विश्व के समाराधन हंसे देखकर उस क्षण, चेतन जनगण अचेत समझे क्या जीत हार? कांटों से विक्षत पद, सभी लोग अवशम्बद, सूख गया जैसे नद सुफलभार सुजलधार। केवल है जन्तु-कवल गई तन्तु नवल-धवल, छुटा छोर का सम्बल, टूटा उर-सुघर हार।