प्रकाश / सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”

रोक रहे हो जिन्हें नहीं अनुराग-मूर्ति वे किसी कृष्ण के उर की गीता अनुपम? और लगाना गले उन्हें– जो धूलि-धूसरित खड़े हुए हैं– कब से प्रियतम, है भ्रम? हुई दुई में अगर कहीं पहचान तो रस भी क्या– अपने ही हित का गया न जब अनुमान? है चेतन का आभास जिसे, देखा भी उसने कभी… Continue reading प्रकाश / सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”

नासमझी / सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”

समझ नहीं सके तुम, हारे हुए झुके तभी नयन तुम्हारे, प्रिय। भरा उल्लास था हॄदय में मेरे जब,– काँपा था वक्ष, तब देखी थी तुमने मेरे मल्लिका के हार की कम्पन, सौन्दर्य को!

उक्ति (जला है जीवन यह) / सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”

जला है जीवन यह आतप में दीर्घकाल; सूखी भूमि, सूखे तरु, सूखे सिक्त आलबाल; बन्द हुआ गुंज, धूलि– धूसर हो गये कुंज, किन्तु पड़ी व्योम उर बन्धु, नील-मेघ-माल।

सहज / सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”

सहज-सहज पग धर आओ उतर; देखें वे सभी तुम्हें पथ पर। वह जो सिर बोझ लिये आ रहा, वह जो बछड़े को नहला रहा, वह जो इस-उससे बतला रहा, देखूँ, वे तुम्हें देख जाते भी हैं ठहर उनके दिल की धड़कन से मिली होगी तस्वीर जो कहीं खिली, देखूँ मैं भी, वह कुछ भी हिली… Continue reading सहज / सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”

और और छबि / सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”

(गीत) और और छबि रे यह, नूतन भी कवि, रे यह और और छबि! समझ तो सही जब भी यह नहीं गगन वह मही नहीं, बादल वह नहीं जहाँ छिपा हुआ पवि, रे यह और और छबि। यज्ञ है यहाँ, जैसा देखा पहले होता अथवा सुना; किन्तु नहीं पहले की, यहाँ कहीं हवि, रे यह… Continue reading और और छबि / सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”

मेरी छबि ला दो / सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”

(गीत) मेरी छबि उर-उर में ला दो! मेरे नयनों से ये सपने समझा दो! जिस स्वर से भरे नवल नीरद, हुए प्राण पावन गा हुआ हृदय भी गदगद, जिस स्वर-वर्षा ने भर दिये सरित-सर-सागर, मेरी यह धरा धन्य हुई भरा नीलाम्बर, वह स्वर शर्मद उनके कण्ठों में गा दो! जिस गति से नयन-नयन मिलते, खिलते… Continue reading मेरी छबि ला दो / सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”

वारिद वंदना / सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”

(गीत) मेरे जीवन में हँस दीं हर वारिद-झर! ऐ आकुल-नयने! सुरभि, मुकुल-शयने! जागीं चल-श्यामल पल्लव पर छवि विश्व की सुघर! पावन-परस सिहरीं, मुक्त-गन्ध विहरीं, लहरीं उर से उर दे सुन्दर तनु आलिंगन कर! अपनापन भूला, प्राण-शयन झूला, बैठीं तुम, चितवन से संचर छाये घन अम्बर!

अभी न होगा मेरा अन्त / सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”

अभी न होगा मेरा अन्त अभी-अभी ही तो आया है मेरे वन में मृदुल वसन्त- अभी न होगा मेरा अन्त हरे-हरे ये पात, डालियाँ, कलियाँ कोमल गात! मैं ही अपना स्वप्न-मृदुल-कर फेरूँगा निद्रित कलियों पर जगा एक प्रत्यूष मनोहर पुष्प-पुष्प से तन्द्रालस लालसा खींच लूँगा मैं, अपने नवजीवन का अमृत सहर्ष सींच दूँगा मैं, द्वार… Continue reading अभी न होगा मेरा अन्त / सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”

खेलूँगी कभी न होली / सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”

खेलूँगी कभी न होली उससे जो नहीं हमजोली । यह आँख नहीं कुछ बोली, यह हुई श्याम की तोली, ऐसी भी रही ठठोली, गाढ़े रेशम की चोली- अपने से अपनी धो लो, अपना घूँघट तुम खोलो, अपनी ही बातें बोलो, मैं बसी पराई टोली । जिनसे होगा कुछ नाता, उनसे रह लेगा माथा, उनसे हैं… Continue reading खेलूँगी कभी न होली / सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”

ख़ून की होली जो खेली / सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”

युवकजनों की है जान ; ख़ून की होली जो खेली । पाया है लोगों में मान, ख़ून की होली जो खेली । रँग गये जैसे पलाश; कुसुम किंशुक के, सुहाए, कोकनद के पाए प्राण, ख़ून की होली जो खेली । निकले क्या कोंपल लाल, फाग की आग लगी है, फागुन की टेढ़ी तान, ख़ून की… Continue reading ख़ून की होली जो खेली / सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”