वो कभी मिल जाएँ तो / ‘अख्तर’ शीरानी

वो कभी मिल जाएँ तो क्या कीजिए रात दिन सूरत को देखा कीजिए चाँदनी रातों में इक इक फूल को बे-ख़ुदी कहती है सजदा कीजिए जो तमन्ना बर न आए उम्र भर उम्र भर उस की तमन्ना कीजिए इश्क़ की रंगीनियों में डूब कर चाँदनी रातों में रोया कीजिए पूछ बैठे हैं हमारा हाल वो… Continue reading वो कभी मिल जाएँ तो / ‘अख्तर’ शीरानी

वादा उस माह-रू के आने का / ‘अख्तर’ शीरानी

वादा उस माह-रू के आने का ये नसीबा सियाह-ख़ाने का कह रही है निगाह-ए-दुज़-दीदा रुख़ बदलने को है ज़माने का ज़र्रे ज़र्रे में बे-हिजाब हैं वो जिन को दावा है मुँह छुपाने का हासिल-ए-उम्र है शबाब मगर इक यही वक़्त है गँवाने का चाँदनी ख़ामोशी और आख़िर शब आ के है वक़्त दिल लगाने का… Continue reading वादा उस माह-रू के आने का / ‘अख्तर’ शीरानी

कुछ तो तंहाई की रातों में / ‘अख्तर’ शीरानी

कुछ तो तन्हाई की रातों में सहारा होता तुम न होते न सही ज़िक्र तुम्हारा होता तर्क-ए-दुनिया का ये दावा है फ़ुज़ूल ऐ ज़ाहिद बार-ए-हस्ती तो ज़रा सर से उतारा होता वो अगर आ न सके मौत ही आई होती हिज्र में कोई तो ग़म-ख़्वार हमारा होता ज़िन्दगी कितनी मुसर्रत से गुज़रती या रब ऐश… Continue reading कुछ तो तंहाई की रातों में / ‘अख्तर’ शीरानी

किस को देखा है ये हुआ क्या है / ‘अख्तर’ शीरानी

किस को देखा है ये हुआ क्या है दिल धड़कता है माजरा क्या है इक मोहब्बत थी मिट चुकी या रब तेरी दुनिया में अब धरा क्या है दिल में लेता है चुटकियाँ कोई है इस दर्द की दवा क्या है हूरें नेकों में बँट चुकी होंगी बाग़-ए-रिज़वाँ में अब रखा क्या है उस के… Continue reading किस को देखा है ये हुआ क्या है / ‘अख्तर’ शीरानी

झूम कर बदली उठी और छा गई / ‘अख्तर’ शीरानी

झूम कर बदली उठी और छा गई सारी दुनिया पर जवानी आ गई आह वो उस की निगाह-ए-मय-फ़रोश जब भी उट्ठी मस्तियाँ बरसा गई गेसू-ए-मुश्कीं में वो रू-ए-हसीं अब्र में बिजली सी इक लहरा गई आलम-ए-मस्ती की तौबा अल-अमाँ पारसाई नश्शा बन कर छा गई आह उस की बे-नियाज़ी की नज़र आरज़ू क्या फूल सी… Continue reading झूम कर बदली उठी और छा गई / ‘अख्तर’ शीरानी

ऐ दिल वो आशिक़ी के / ‘अख्तर’ शीरानी

ऐ दिल वो आशिक़ी के फ़साने किधर गए वो उम्र क्या हुई वो ज़माने किधर गए वीराँ हैं सहन-ओ-बाग़ बहारों को क्या हुआ वो बुलबुलें कहाँ वो तराने किधर गए है नज्द में सुकूत हवाओं को क्या हुआ लैलाएँ हैं ख़मोश दिवाने किधर गए उजड़े पड़े हैं दश्त ग़ज़ालों पे क्या बनी सूने हैं कोहसार… Continue reading ऐ दिल वो आशिक़ी के / ‘अख्तर’ शीरानी

तर्क-ए-वफ़ा तुम क्यों करते हो? / ऐतबार साज़िद

तर्क-ए-वफ़ा तुम क्यों करते हो? इतनी क्या बेजारी है हम ने कोई शिकायत की है? बेशक जान हमारी है तुम ने खुद को बाँट दिया है कैसे इतनी खानों में सच्चों से भी दुआ सलाम है, झूठों से भी यारी है कैसा हिज्र क़यामत का है, लहू में शोले नाचते हैं आंखें बंद नहीं हो… Continue reading तर्क-ए-वफ़ा तुम क्यों करते हो? / ऐतबार साज़िद

वो ही लोग मुझसे बिछड़ गए / ऐतबार साज़िद

जो ख्याल थे, न कयास थे, वो ही लोग मुझसे बिछड़ गए जो मोहब्बतों की आस थे, वो ही लोग मुझसे बिछड़ गए जिन्हें मानता नहीं ये दिल, वो ही लोग मेरे है हमसफ़र मुझे हर तरह से जो रास थे, वो ही लोग मुझसे बिछड़ गए मुझे लम्हा भर की रफ़ाक़तों के सराब बोहत… Continue reading वो ही लोग मुझसे बिछड़ गए / ऐतबार साज़िद

अभी आग पूरी जली नहीं / ऐतबार साज़िद

अभी आग पूरी जली नहीं, अभी शोले ऊँचे उठे नहीं अभी कहाँ का हूँ मैं गज़लसारा, मेरे खाल-ओ-खद अभी बने नहीं अभी सीनाजोर नहीं हुआ, मेरे दिल के गम का मामला कोई गहरा दर्द मिला नहीं, अभी ऐसे चरके लगे नहीं इस सैल-ए-नूर की निश्बतों से मेरे दरीचा-ए-दिल में आ मेरे ताकचिनो में है रौशनी,… Continue reading अभी आग पूरी जली नहीं / ऐतबार साज़िद

मेरी राहों के / ऐतबार साज़िद

मेरी राहों के जो जुगनू हैं वो तेरे हैं तेरी आँखों के जो अँधेरे हैं वो मेरे है छू सकता नहीं कोई गम तुझको क्यूंकि तुझ पर दुआओं के जो पहरे हैं वो मेरे हैं