तोसों लाग्यो नेह रे प्यारे, नागर नंद कुमार। मुरली तेरी मन हर्यो, बिसर्यो घर-व्यौहार॥ जब तें सवननि धुनि परि, घर आँगण न सुहाइ। पारधि ज्यूँ चूकै नहीं, मृगी बेधी दइ आइ॥ पानी पीर न जानई ज्यों मीन तड़फि मरि जाइ। रसिक मधुप के मरम को नहिं समुझत कमल सुभाइ॥ दीपक को जो दया नहिं, उड़ि-उड़ि… Continue reading तोसों लाग्यो नेह रे प्यारे, नागर नंद कुमार / मीराबाई
श्याम मोसूँ ऐंडो डोलै हो / मीराबाई
श्याम मोसूँ ऐंडो डोलै हो। औरन सूँ खेलै धमार, म्हासूँ मुखहुँ न बोले हो॥ म्हारी गलियाँ ना फिरे वाके, आँगन डोलै हो। म्हारी अँगुली ना छुए वाकी, बहियाँ मरोरै हो॥ म्हारो अँचरा ना छुए वाको, घूँघट खोलै हो। ‘मीरा’ को प्रभु साँवरो, रंग रसिया डोलै हो॥
पग घूँघरू बाँध मीरा नाची रे / मीराबाई
पग घूँघरू बाँध मीरा नाची रे। मैं तो मेरे नारायण की आपहि हो गई दासी रे। लोग कहै मीरा भई बावरी न्यात कहै कुलनासी रे॥ विष का प्याला राणाजी भेज्या पीवत मीरा हाँसी रे। ‘मीरा’ के प्रभु गिरिधर नागर सहज मिले अविनासी रे॥
पायो जी म्हें तो राम रतन धन पायो / मीराबाई
पायो जी म्हें तो राम रतन धन पायो। वस्तु अमोलक दी म्हारे सतगुरू, किरपा कर अपनायो॥ जनम-जनम की पूँजी पाई, जग में सभी खोवायो। खरच न खूटै चोर न लूटै, दिन-दिन बढ़त सवायो॥ सत की नाँव खेवटिया सतगुरू, भवसागर तर आयो। ‘मीरा’ के प्रभु गिरिधर नागर, हरख-हरख जस पायो॥
बादल देख डरी / मीराबाई
बादल देख डरी हो, स्याम, मैं बादल देख डरी श्याम मैं बादल देख डरी काली-पीली घटा ऊमड़ी बरस्यो एक घरी जित जाऊं तित पाणी पाणी हुई सब भोम हरी जाके पिया परदेस बसत है भीजे बाहर खरी मीरा के प्रभु गिरधर नागर कीजो प्रीत खरी श्याम मैं बादल देख डरी
मोती मूँगे उतार बनमाला पोई / मीराबाई
मोती मूँगे उतार बनमाला पोई॥ अंसुवन जल सींचि सींचि प्रेम बेलि बोई। अब तो बेल फैल गई आणँद फल होई॥ दूध की मथनिया बडे प्रेम से बिलोई। माखन जब काढि लियो छाछ पिये कोई॥ भगत देखि राजी हुई जगत देखि रोई। दासी ‘मीरा लाल गिरिधर तारो अब मोही॥
नैना निपट बंकट छबि अटके / मीराबाई
नैना निपट बंकट छबि अटके। देखत रूप मदनमोहन को, पियत पियूख न मटके। बारिज भवाँ अलक टेढी मनौ, अति सुगंध रस अटके॥ टेढी कटि, टेढी कर मुरली, टेढी पाग लट लटके। ‘मीरा प्रभु के रूप लुभानी, गिरिधर नागर नट के॥
हरि तुम हरो जन की भीर / मीराबाई
हरि तुम हरो जन की भीर। द्रोपदी की लाज राखी, तुम बढायो चीर॥ भक्त कारण रूप नरहरि, धरयो आप शरीर। हिरणकश्यपु मार दीन्हों, धरयो नाहिंन धीर॥ बूडते गजराज राखे, कियो बाहर नीर। दासि ‘मीरा लाल गिरिधर, दु:ख जहाँ तहँ पीर॥
नहिं भावै थांरो देसड़लो जी रंगरूड़ो / मीराबाई
नहिं भावै थांरो देसड़लो जी रंगरूड़ो॥ थांरा देसा में राणा साध नहीं छै, लोग बसे सब कूड़ो। गहणा गांठी राणा हम सब त्यागा, त्याग्यो कररो चूड़ो॥ काजल टीकी हम सब त्याग्या, त्याग्यो है बांधन जूड़ो। मीरा के प्रभु गिरधर नागर बर पायो छै रूड़ो॥ शब्दार्थ :- थांरो = तुम्हारा। देसलड़ो = देश। रंग रूड़ो =विचित्र।… Continue reading नहिं भावै थांरो देसड़लो जी रंगरूड़ो / मीराबाई
पदावली / भाग-6 / मीराबाई
1. पग घूँघरू बाँध मीरा नाची रे। मैं तो मेरे नारायण की आपहि हो गई दासी रे। लोग कहै मीरा भई बावरी न्यात कहै कुलनासी रे॥ विष का प्याला राणाजी भेज्या पीवत मीरा हाँसी रे। ‘मीरा’ के प्रभु गिरिधर नागर सहज मिले अविनासी रे॥ 2. पतीया मैं कैशी लीखूं, लीखये न जातरे॥ध्रु०॥ कलम धरत मेरा… Continue reading पदावली / भाग-6 / मीराबाई