राम-नाम-रस पीजै / मीराबाई

राम-नाम-रस पीजै। मनवा! राम-नाम-रस पीजै। तजि कुसंग सतसंग बैठि नित, हरि-चर्चा सुणि लीजै। काम क्रोध मद मोह लोभ कूं, चित से बाहय दीजै। मीरा के प्रभु गिरधर नागर, ता के रंग में भीजै।

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माई री! / मीराबाई

माई री! मैं तो लियो गोविंदो मोल। कोई कहै छानै, कोई कहै छुपकै, लियो री बजंता ढोल। कोई कहै मुहंघो, कोई कहै सुहंगो, लियो री तराजू तोल। कोई कहै कारो, कोई कहै गोरो, लियो री अमोलिक मोल। या ही कूं सब जाणत है, लियो री आँखी खोल। मीरा कूं प्रभु दरसण दीज्‍यो, पूरब जनम को… Continue reading माई री! / मीराबाई

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मीरा को प्रभु साँची दासी बनाओ / मीराबाई

राग सहाना मीरा को प्रभु साँची दासी बनाओ। झूठे धंधों से मेरा फंदा छुड़ाओ॥ लूटे ही लेत विवेक का डेरा। बुधि बल यदपि करूं बहुतेरा॥ हाय!हाय! नहिं कछु बस मेरा। मरत हूं बिबस प्रभु धाओ सवेरा॥ धर्म उपदेश नितप्रति सुनती हूं। मन कुचाल से भी डरती हूं॥ सदा साधु-सेवा करती हूं। सुमिरण ध्यान में चित… Continue reading मीरा को प्रभु साँची दासी बनाओ / मीराबाई

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मीरा की विनती छै जी / मीराबाई

दरस म्हारे बेगि दीज्यो जी ! ओ जी! अन्तरजामी ओ राम ! खबर म्हारी बेगि लीज्यो जी आप बिन मोहे कल ना पडत है जी ! ओजी! तडपत हूँ दिन रैन रैन में नीर ढले है जी गुण तो प्रभुजी मों में एक नहीं छै जी ! ओ जी अवगुण भरे हैं अनेक, अवगुण म्हारां… Continue reading मीरा की विनती छै जी / मीराबाई

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म्हारो प्रणाम / मीराबाई

म्हारो प्रणाम बांकेबिहारीको। मोर मुकुट माथे तिलक बिराजे। कुण्डल अलका कारीको म्हारो प्रणाम अधर मधुर कर बंसी बजावै। रीझ रीझौ राधाप्यारीको म्हारो प्रणाम यह छबि देख मगन भई मीरा। मोहन गिरवरधारीको म्हारो प्रणाम

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लाज राखो महाराज / मीराबाई

अब तो निभायां सरेगी बाँह गहे की लाज। समरथ शरण तुम्हारी सैयां सरब सुधारण काज।। भवसागर संसार अपरबल जामे तुम हो जहाज। गिरधारां आधार जगत गुरु तुम बिन होय अकाज।। जुग जुग भीर हरी भगतन की दीनी मोक्ष समाज। “मीरा” शरण गही चरणन की लाज रखो महाराज।।

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भजो रे मन गोविन्दा / मीराबाई

नटवर नागर नन्दा, भजो रे मन गोविन्दा, श्याम सुन्दर मुख चन्दा, भजो रे मन गोविन्दा। तू ही नटवर, तू ही नागर, तू ही बाल मुकुन्दा , सब देवन में कृष्ण बड़े हैं, ज्यूं तारा बिच चंदा। सब सखियन में राधा जी बड़ी हैं, ज्यूं नदियन बिच गंगा, ध्रुव तारे, प्रहलाद उबारे, नरसिंह रूप धरता। कालीदह… Continue reading भजो रे मन गोविन्दा / मीराबाई

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तुमरे दरस बिन बावरी / मीराबाई

दूर नगरी, बड़ी दूर नगरी-नगरी कैसे मैं तेरी गोकुल नगरी दूर नगरी बड़ी दूर नगरी रात को कान्हा डर माही लागे, दिन को तो देखे सारी नगरी। दूर नगरी… सखी संग कान्हा शर्म मोहे लागे, अकेली तो भूल जाऊँ तेरी डगरी। दूर नगरी… धीरे-धीरे चलूँ तो कमर मोरी लचके झटपट चलूँ तो छलकाए गगरी। दूर… Continue reading तुमरे दरस बिन बावरी / मीराबाई

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भजन बिना नरफीको / मीराबाई

आज मोहिं लागे वृन्दावन नीको।। घर-घर तुलसी ठाकुर सेवा, दरसन गोविन्द जी को।।१।। निरमल नीर बहत जमुना में, भोजन दूध दही को। रतन सिंघासण आपु बिराजैं, मुकुट धरयो तुलसी को।।२।। कुंजन कुंजन फिरत राधिका, सबद सुणत मुरली को। “मीरा” के प्रभु गिरधर नागर, भजन बिना नर फीको।।३।।

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राम रतन धन पायो / मीराबाई

पायो जी म्हे तो राम रतन धन पायो।। टेक।। वस्तु अमोलक दी मेरे सतगुरु, किरपा कर अपनायो।। जनम जनम की पूंजी पाई, जग में सभी खोवायो।। खायो न खरच चोर न लेवे, दिन-दिन बढ़त सवायो।। सत की नाव खेवटिया सतगुरु, भवसागर तर आयो।। “मीरा” के प्रभु गिरधर नागर, हरस हरस जश गायो।।

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