फागुन के दिन चार होली खेल मना रे / मीराबाई

राग होरी सिन्दूरा फागुन के दिन चार होली खेल मना रे॥ बिन करताल पखावज बाजै अणहदकी झणकार रे। बिन सुर राग छतीसूं गावै रोम रोम रणकार रे॥ सील संतोखकी केसर घोली प्रेम प्रीत पिचकार रे। उड़त गुलाल लाल भयो अंबर, बरसत रंग अपार रे॥ घटके सब पट खोल दिये हैं लोकलाज सब डार रे। मीराके… Continue reading फागुन के दिन चार होली खेल मना रे / मीराबाई

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मैं गिरधर रंग-राती, सैयां मैं / मीराबाई

मुखपृष्ठ»रचनाकारों की सूची»मीराबाई» राग धानी मैं गिरधर रंग-राती, सैयां मैं॥ पचरंग चोला पहर सखी री, मैं झिरमिट रमवा जाती। झिरमिटमां मोहि मोहन मिलियो, खोल मिली तन गाती॥ कोईके पिया परदेस बसत हैं, लिख लिख भेजें पाती। मेरा पिया मेरे हीय बसत है, ना कहुं आती जाती॥ चंदा जायगा सूरज जायगा, जायगी धरण अकासी। पवन पाणी… Continue reading मैं गिरधर रंग-राती, सैयां मैं / मीराबाई

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चालो मन गंगा जमुना तीर / मीराबाई

राग सूहा चालो मन गंगा जमुना तीर। गंगा जमुना निरमल पाणी सीतल होत सरीर। बंसी बजावत गावत कान्हो, संग लियो बलबीर॥ मोर मुगट पीताम्बर सोहे कुण्डल झलकत हीर। मीराके प्रभु गिरधर नागर चरण कंवल पर सीर॥ शब्दार्थ :- कान्हो =कन्हैया। बलबीर =कृष्ण के बड़े भाई बलराम। झलकत =जगमगाते हैं। सीर = सिर।

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या ब्रज में कछु देख्यो री टोना / मीराबाई

राग मधुमाध सारंग या ब्रज में कछु देख्यो री टोना॥ लै मटकी सिर चली गुजरिया, आगे मिले बाबा नंदजी के छोना। दधिको नाम बिसरि गयो प्यारी, लेलेहु री कोउ स्याम सलोना॥ बिंद्राबनकी कुंज गलिन में, आंख लगाय गयो मनमोहना। मीरा के प्रभु गिरधर नागर, सुंदर स्याम सुधर रसलौना॥ शब्दार्थ :- टोना =जादू। गुजरिया =ग्वालिन। छोना… Continue reading या ब्रज में कछु देख्यो री टोना / मीराबाई

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आली, म्हांने लागे वृन्दावन नीको / मीराबाई

राग वृन्दावनी आली, म्हांने लागे वृन्दावन नीको। घर घर तुलसी ठाकुर पूजा दरसण गोविन्दजी को॥ निरमल नीर बहत जमुना में, भोजन दूध दही को। रतन सिंघासन आप बिराजैं, मुगट धर्‌यो तुलसी को॥ कुंजन कुंजन फिरति राधिका, सबद सुनन मुरली को। मीरा के प्रभु गिरधर नागर, बजन बिना नर फीको॥ शब्दार्थ :- म्हांने =मुझे। मुगट =… Continue reading आली, म्हांने लागे वृन्दावन नीको / मीराबाई

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राणाजी, म्हे तो गोविन्द का गुण गास्यां / मीराबाई

राग पूरिया कल्यान राणाजी, म्हे तो गोविन्द का गुण गास्यां। चरणामृत को नेम हमारे, नित उठ दरसण जास्यां॥ हरि मंदर में निरत करास्यां, घूंघरियां धमकास्यां। राम नाम का झाझ चलास्यां भवसागर तर जास्यां॥ यह संसार बाड़ का कांटा ज्या संगत नहीं जास्यां। मीरा कहै प्रभु गिरधर नागर निरख परख गुण गास्यां॥ शब्दार्थ :- गास्यां =गाऊंगी।… Continue reading राणाजी, म्हे तो गोविन्द का गुण गास्यां / मीराबाई

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राणाजी, थे क्यांने राखो म्हांसूं बैर / मीराबाई

राग अगना राणाजी, थे क्यांने राखो म्हांसूं बैर। थे तो राणाजी म्हांने इसड़ा लागो, ज्यूं बृच्छन में कैर। महल अटारी हम सब त्याग्या, त्याग्यो थारो बसनो सैर॥ काजल टीकी राणा हम सब त्याग्या, भगती-चादर पैर। मीरा के प्रभु गिरधर नागर इमरित कर दियो झैर॥ शब्दार्थ :- क्यां ने = किसलिए। म्हासूं = मुझसे। इसड़ा =… Continue reading राणाजी, थे क्यांने राखो म्हांसूं बैर / मीराबाई

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राम नाम मेरे मन बसियो, रसियो राम रिझाऊं ए माय / मीराबाई

राग खंभावती राम नाम मेरे मन बसियो, रसियो राम रिझाऊं ए माय। मैं मंदभागण परम अभागण, कीरत कैसे गाऊं ए माय॥ बिरह पिंजरकी बाड़ सखी रीं,उठकर जी हुलसाऊं ए माय। मनकूं मार सजूं सतगुरसूं, दुरमत दूर गमाऊं ए माय॥ डंको नाम सुरतकी डोरी, कड़ियां प्रेम चढ़ाऊं ए माय। प्रेम को ढोल बन्यो अति भारी, मगन… Continue reading राम नाम मेरे मन बसियो, रसियो राम रिझाऊं ए माय / मीराबाई

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राणाजी, म्हांरी प्रीति पुरबली मैं कांई करूं / मीराबाई

राग पीलू राणाजी, म्हांरी प्रीति पुरबली मैं कांई करूं॥ राम नाम बिन नहीं आवड़े, हिबड़ो झोला खाय। भोजनिया नहीं भावे म्हांने, नींदडलीं नहिं आय॥ विष को प्यालो भेजियो जी, `जाओ मीरा पास,’ कर चरणामृत पी गई, म्हारे गोविन्द रे बिसवास॥ बिषको प्यालो पीं गई जीं,भजन करो राठौर, थांरी मीरा ना मरूं, म्हारो राखणवालो और॥ छापा… Continue reading राणाजी, म्हांरी प्रीति पुरबली मैं कांई करूं / मीराबाई

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बरजी मैं काहूकी नाहिं रहूं / मीराबाई

राग कामोद बरजी मैं काहूकी नाहिं रहूं। सुणो री सखी तुम चेतन होयकै मनकी बात कहूं॥ साध संगति कर हरि सुख लेऊं जगसूं दूर रहूं। तन धन मेरो सबही जावो भल मेरो सीस लहूं॥ मन मेरो लागो सुमरण सेती सबका मैं बोल सहूं। मीरा के प्रभु हरि अविनासी सतगुर सरण गहूं॥ शब्दार्थ :- बरजि =… Continue reading बरजी मैं काहूकी नाहिं रहूं / मीराबाई

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