मोहन आवनकी साई किजोरे। आवनकी मन भावनकी॥ कोई०॥ध्रु०॥ आप न आवे पतिया न भेजे | ए बात ललचावनकी॥को०॥१॥ बिन दरशन व्याकुल भई सजनी। जैशी बिजलीयां श्रावनकी॥ को०॥२॥ क्या करूं शक्ति जाऊं मोरी सजनी। पांख होवे तो उडजावनकी॥ को०॥३॥ मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर | इच्छा लगी हरी बतलावनकी॥ को०॥४॥
होरी खेलनकू आई राधा प्यारी हाथ लिये पिचकरी / मीराबाई
होरी खेलनकू आई राधा प्यारी हाथ लिये पिचकरी॥ध्रु०॥ कितना बरसे कुंवर कन्हैया कितना बरस राधे प्यारी॥ हाथ०॥१॥ सात बरसके कुंवर कन्हैया बारा बरसकी राधे प्यारी॥ हाथ०॥२॥ अंगली पकड मेरो पोचो पकड्यो बैयां पकड झक झारी॥ हाथ०॥३॥ मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर तुम जीते हम हारी॥ हाथ०॥४॥
क्या करूं मैं बनमें गई घर होती / मीराबाई
क्या करूं मैं बनमें गई घर होती। तो शामकू मनाई लेती॥ध्रु०॥ गोरी गोरी बईया हरी हरी चुडियां। झाला देके बुलालेती॥१॥ अपने शाम संग चौपट रमती। पासा डालके जीता लेती॥२॥ बडी बडी अखिया झीणा झीणा सुरमा। जोतसे जोत मिला लेती॥३॥ मीराबाई कहे प्रभु गिरिधर नागर। चरनकमल लपटा लेती॥४॥
हरिनाम बिना नर ऐसा है / मीराबाई
हरिनाम बिना नर ऐसा है। दीपकबीन मंदिर जैसा है॥ध्रु०॥ जैसे बिना पुरुखकी नारी है। जैसे पुत्रबिना मातारी है। जलबिन सरोबर जैसा है। हरिनामबिना नर ऐसा है॥१॥ जैसे सशीविन रजनी सोई है। जैसे बिना लौकनी रसोई है। घरधनी बिन घर जैसा है। हरिनामबिना नर ऐसा है॥२॥ ठुठर बिन वृक्ष बनाया है। जैसा सुम संचरी नाया है।… Continue reading हरिनाम बिना नर ऐसा है / मीराबाई
नाथ तुम जानतहो सब घटकी / मीराबाई
नाथ तुम जानतहो सब घटकी। मीरा भक्ति करे प्रगटकी॥ध्रु०॥ ध्यान धरी प्रभु मीरा संभारे पूजा करे अट पटकी। शालिग्रामकूं चंदन चढत है भाल तिलक बिच बिंदकी॥१॥ राम मंदिरमें मीराबाई नाचे ताल बजावे चपटी। पाऊमें नेपुर रुमझुम बाजे। लाज संभार गुंगटकी॥२॥ झेर कटोरा राणाजिये भेज्या संत संगत मीरा अटकी। ले चरणामृत मिराये पिधुं होगइ अमृत बटकी॥३॥… Continue reading नाथ तुम जानतहो सब घटकी / मीराबाई
चालो मान गंगा जमुना तीर गंगा जमुना तीर / मीराबाई
चालो मान गंगा जमुना तीर गंगा जमुना तीर॥ध्रु०॥ गंगा जमुना निरमल पानी शीतल होत सरीस॥१॥ बन्सी बजावत गावत काना संग लीये बलवीर॥२॥ मोर मुगुट पितांबर शोभे। कुंडल झलकत हीर॥३॥ मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर चरनकमल शीर॥४॥
भोलानाथ दिंगबर ये दुःख मेरा हरोरे / मीराबाई
भोलानाथ दिंगबर ये दुःख मेरा हरोरे॥ध्रु०॥ शीतल चंदन बेल पतरवा मस्तक गंगा धरीरे॥१॥ अर्धांगी गौरी पुत्र गजानन चंद्रकी रेख धरीरे॥२॥ शिव शंकरके तीन नेत्र है अद्भूत रूप धरोरे॥३॥ आसन मार सिंहासन बैठे शांत समाधी धरोरे॥४॥ मीरा कहे प्रभुका जस गांवत शिवजीके पैयां परोरे॥५॥
मन अटकी मेरे दिल अटकी / मीराबाई
मन अटकी मेरे दिल अटकी। हो मुगुटकी लटक मन अटकी॥ध्रु०॥ माथे मुकुट कोर चंदनकी। शोभा है पीरे पटकी॥ मन०॥१॥ शंख चक्र गदा पद्म बिराजे। गुंजमाल मेरे है अटकी॥ मन०॥२॥ अंतर ध्यान भये गोपीयनमें। सुध न रही जमूना तटकी॥ मन०॥३॥ पात पात ब्रिंदाबन धुंडे। कुंज कुंज राधे भटकी॥ मन०॥४॥ जमुनाके नीर तीर धेनु चरावे। सुरत रही… Continue reading मन अटकी मेरे दिल अटकी / मीराबाई
जो तुम तोडो पियो मैं नही तोडू / मीराबाई
जो तुम तोडो पियो मैं नही तोडू। तोरी प्रीत तोडी कृष्ण कोन संग जोडू ॥ध्रु०॥ तुम भये तरुवर मैं भई पखिया। तुम भये सरोवर मैं तोरी मछिया॥ जो०॥१॥ तुम भये गिरिवर मैं भई चारा। तुम भये चंद्रा हम भये चकोरा॥ जो०॥२॥ तुम भये मोती प्रभु हम भये धागा। तुम भये सोना हम भये स्वागा॥ जो०॥३॥… Continue reading जो तुम तोडो पियो मैं नही तोडू / मीराबाई
आज मेरेओ भाग जागो साधु आये पावना / मीराबाई
आज मेरेओ भाग जागो साधु आये पावना॥ध्रु०॥ अंग अंग फूल गये तनकी तपत गये। सद्गुरु लागे रामा शब्द सोहामणा॥ आ०॥१॥ नित्य प्रत्यय नेणा निरखु आज अति मनमें हरखू। बाजत है ताल मृदंग मधुरसे गावणा॥ आ०॥२॥ मोर मुगुट पीतांबर शोभे छबी देखी मन मोहे। मीराबाई हरख निरख आनंद बधामणा॥ आ०॥३॥