रंगेलो राणो कई करसो मारो राज्य। हूं तो छांडी छांडी कुलनी लाज॥ध्रु०॥ पग बांधीनें घुंगरा हातमों छीनी सतार। आपने ठाकूरजीके मंदिर नाचुं वो हरी जागे दिनानाथ ॥ रंगेलो०॥१॥ बिखको प्यालो राणाजीने भेजो कैं दिजे मिराबाई हात। कर चरणामृत पीगई मीराबाई ठाकुरको प्रसाद॥ रंगेलो०॥२॥ सापरो पेटारो राणाजीनें भेजों दासाजीने हात। सापरो उपाडीनें गलामों डारयो हो गयो… Continue reading रंगेलो राणो कई करसो मारो राज्य / मीराबाई
राधे देवो बांसरी मोरी / मीराबाई
राधे देवो बांसरी मोरी। मुरली हमारी॥ध्रु०॥ पान पात सब ब्रिंदावन धुंडयो। कुंजगलीनमों सब हेरी॥१॥ बांसरी बिन मोहे कल न परहे। पया लागत तोरी॥२॥ काहेसुं गावूं काहेंसुं बजाऊं। काहेसुं लाऊं गवा घहेरी॥३॥ मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर। चरणकी मैं तो चित्त चोरी॥४॥
राधे तोरे नयनमों जदुबीर / मीराबाई
राधे तोरे नयनमों जदुबीर॥ध्रु०॥ आदी आदी रातमों बाल चमके। झीरमीर बरसत नीर॥१॥ मोर मुगुट पितांबर शोभे। कुंडल झलकत हीर॥२॥ मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर। चरणकमल शीर॥३॥
मोरी लागी लटक गुरु चरणकी / मीराबाई
मोरी लागी लटक गुरु चरणकी॥ध्रु०॥ चरन बिना मुज कछु नही भावे। झूंठ माया सब सपनकी॥१॥ भवसागर सब सुख गयी है। फिकीर नही मुज तरुणोनकी॥२॥ मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर। उलट भयी मोरे नयननकी॥३॥
मथुराके कान मोही मोही मोही / मीराबाई
मथुराके कान मोही मोही मोही॥ध्रु०॥ खांदे कामरीया हातमों लकरीया। सीर पाग लाल लोई लोई॥१॥ पाउपें पैंजण आण वट बीचवे। चाल चलत ताता थै थै थै॥२॥ मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर। हृदय बसत प्रभू तुही तुही तुही तुही॥३॥
मन केरो जेवो चंद्र छे / मीराबाई
मन केरो जेवो चंद्र छे। रास रमे नंद लालो रे॥ध्रु०॥ नटवर बेश धर्यो नंद लाले। सौ ओघाने चालोरे॥१॥ गानतान वाजिंत्र बाजे। नाचे जशोदानो काळोरे॥२॥ सोळा सहस्त्र अष्ट पटराणी। बच्चे रह्यो मारो बहालोरे॥३॥ मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर। रणछोडे दिसे छोगळोरे॥४॥
मनुवा बाबारे सुमरले मन सिताराम / मीराबाई
मनुवा बाबारे सुमरले मन सिताराम॥ध्रु०॥ बडे बडे भूपती सुलतान उनके। डेरे भय मैदान॥१॥ लंकाके रावण कालने खाया। तूं क्या है कंगाल॥२॥ मीरा कहे प्रभु गिरिधर लाल। भज गोपाल त्यज जंजाल॥३॥
मदन गोपाल नंदजीको लाल प्रभुजी / मीराबाई
मदन गोपाल नंदजीको लाल प्रभुजी॥ध्रु०॥ बालपनकी प्रीत बिखायो। नवनीत धरियो नंदलाल॥१॥ कुब्जा हीनकी तुम पत राखो। हम ब्रीज नारी भई बेहाल॥२॥ मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर। हम जपे यही जपमाल॥३॥
भज मन शंकर भोलानाथ भज मन / मीराबाई
भज मन शंकर भोलानाथ भज मन॥ध्रु०॥ अंग विभूत सबही शोभा। ऊपर फुलनकी बास॥१॥ एकहि लोटाभर जल चावल। चाहत ऊपर बेलकी पात॥२॥ मीरा कहे प्रभू गिरिधर नागर। पूजा करले समजे आपहि आप॥३॥
जल कैशी भरुं जमुना भयेरी / मीराबाई
जल कैशी भरुं जमुना भयेरी॥ध्रु०॥ खडी भरुं तो कृष्ण दिखत है। बैठ भरुं तो भीजे चुनडी॥१॥ मोर मुगुटअ पीतांबर शोभे। छुम छुम बाजत मुरली॥२॥ मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर। चणरकमलकी मैं जेरी॥३॥