अपनी गरज हो मिटी सावरे हाम देखी तुमरी प्रीत॥ध्रु०॥ आपन जाय दुवारका छाय ऐसे बेहद भये हो नचिंत॥ ठोर०॥१॥ ठार सलेव करित हो कुलभवर कीसि रीत॥२॥ बीन दरसन कलना परत हे आपनी कीसि प्रीत। मीराके प्रभु गिरिधर नागर प्रभुचरन न परचित॥३॥
खबर मोरी लेजारे बंदा / मीराबाई
खबर मोरी लेजारे बंदा जावत हो तुम उनदेस॥ध्रु०॥ हो नंदके नंदजीसु यूं जाई कहीयो। एकबार दरसन दे जारे॥१॥ आप बिहारे दरसन तिहारे। कृपादृष्टि करी जारे॥२॥ नंदवन छांड सिंधु तब वसीयो। एक हाम पैन सहजीरे। जो दिन ते सखी मधुबन छांडो। ले गयो काळ कलेजारे॥३॥ मीराके प्रभु गिरिधर नागर। सबही बोल सजारे॥४॥
सखी आपनो दाम खोटो / मीराबाई
सखी आपनो दाम खोटो दोस काहां कुबज्याकू॥ध्रु०॥ कुबजा दासी कंस रायकी। दराय कोठोडो॥१॥ आपन जाय दुबारका छाय। कागद हूं कोठोडो॥२॥ मीराके प्रभु गिरिधर नागर। कुबजा बडी हरी छोडो॥३॥
दरद जाने कोय हेली / मीराबाई
दरद जाने कोय हेली। मैं दरद दिवानी॥ध्रु०॥ घायलकी गत घायल ज्याने। लागी हिये॥१॥ सुली उपर सेजहमारी। किसबीद रहीये सोय॥२॥ मीराके प्रभु गिरिधर नागर। वदे सामलीया होय॥३॥
राम बिन निंद न आवे / मीराबाई
राम बिन निंद न आवे। बिरह सतावे प्रेमकी आच ठुरावे॥ध्रु०॥ पियाकी जोतबिन मो दर आंधारो दीपक कदायन आवे। पियाजीबिना मो सेज न आलुनी जाननरे ए बिहावे। कबु घर आवे घर आवे॥१॥ दादर मोर पपीया बोले कोयल सबद सुनावे। गुमट घटा ओल रहगई दमक चमक दुरावे। नैन भर आवें॥२॥ काहां करूं कितना उसखेरू बदन कोई न… Continue reading राम बिन निंद न आवे / मीराबाई
हारि आवदे खोसरी / मीराबाई
हारि आवदे खोसरी। बुंद न भीजे मो सारी॥ध्रु०॥ येक बरसत दुजी पवन चलत है। तिजी जमुना गहरी॥१॥ एक जोबन दुजी दहीकी मथीनया। तिजी हरि दे छे गारी॥२॥ ब्रज जशोदा राणी आपने लालकू। इन सुबहूमें हारी॥३॥ मीराके प्रभु गिरिधर नागर। प्रभु चरणा परवारी॥४॥
माई मेरो मोहनमें मन हारूं / मीराबाई
माई मेरो मोहनमें मन हारूं॥ध्रु०॥ कांह करुं कीत जाऊं सजनी। प्रान पुरससु बरयो॥१॥ हूं जल भरने जातथी सजनी। कलस माथे धरयो॥२॥ सावरीसी कीसोर मूरत। मुरलीमें कछु टोनो करयो॥३॥ लोकलाज बिसार डारी। तबही कारज सरयो॥४॥ दास मीरा लाल गिरिधर। छान ये बर बरयो॥५॥
राजा थारे कुबजाही मन मानी / मीराबाई
राजा थारे कुबजाही मन मानी। म्हांसु आ बोलना॥ध्रु०॥ रसकोबी हरि छेला हारियो बनसीवाला जादु लाया। भुलगई सुद सारी॥१॥ तुम उधो हरिसो जाय कैहीयो। कछु नही चूक हमारी॥२॥ मिराके प्रभु गिरिधर नागर। चरण कमल उरधारी॥३॥
हमे कैशी घोर उतारो / मीराबाई
हमे कैशी घोर उतारो। द्रग आंजन सबही धोडावे। माथे तिलक बनावे पेहरो चोलावे॥१॥ हमारो कह्यो सुनो बिष लाग्यो। उनके जाय भवन रस चाख्यो। उवासे हिलमिल रहना हासना बोलना॥२॥ जमुनाके तट धेनु चरावे। बन्सीमें कछु आचरज गावे। मीठी राग सुनावे बोले बोलना॥३॥ हामारी प्रीत तुम संग लागी। लोकलाज कुलकी सब त्यागी। मीराके प्रभु गिरिधारी बन बन… Continue reading हमे कैशी घोर उतारो / मीराबाई
लटपटी पेचा बांधा राज / मीराबाई
लटपटी पेचा बांधा राज॥ध्रु०॥ सास बुरी घर ननंद हाटेली। तुमसे आठे कियो काज॥१॥ निसीदन मोहिके कलन परत है। बनसीनें सार्यो काज॥२॥ मीराके प्रभु गिरिधन नागर। चरन कमल सिरताज॥३॥