तब किसी की याद आती / गोपालदास “नीरज”

तब किसी की याद आती! पेट का धन्धा खत्म कर लौटता हूँ साँझ को घर बन्द घर पर, बन्द ताले पर थकी जब आँख जाती। तब किसी की याद आती! रात गर्मी से झुलसकर आँख जब लगती न पलभर और पंखा डुलडुलाकर बाँह थक-थक शीघ्र जाती। तब किसी की याद आती! अश्रु-कण मेरे नयन में… Continue reading तब किसी की याद आती / गोपालदास “नीरज”

भूल जाना / गोपालदास “नीरज”

भूल पाओ तो मुझे तुम भूल जाना! साथ देखा था कभी जो एक तारा आज भी अपनी डगर का वो सहारा आज भी हैं देखते हम तुम उसे पर है हमारे बीच गहरी अश्रु-धारा नाव चिर जर्जर नहीं पतवार कर में किस तरह फ़िर हो तुम्हारे पास आना। भूल पाओ तो मुझे तुम भूल जाना!… Continue reading भूल जाना / गोपालदास “नीरज”

मुस्कुराकर चल मुसाफिर / गोपालदास “नीरज”

पंथ पर चलना तुझे तो मुस्कुराकर चल मुसाफिर! वह मुसाफिर क्या जिसे कुछ शूल ही पथ के थका दें? हौसला वह क्या जिसे कुछ मुश्किलें पीछे हटा दें? वह प्रगति भी क्या जिसे कुछ रंगिनी कलियाँ तितलियाँ, मुस्कुराकर गुनगुनाकर ध्येय-पथ, मंजिल भुला दें? जिन्दगी की राह पर केवल वही पंथी सफल है, आँधियों में, बिजलियों… Continue reading मुस्कुराकर चल मुसाफिर / गोपालदास “नीरज”

अब न आउँगा / गोपालदास “नीरज”

अब न आउँगा तुम्हारे द्वार। जब तुम्हारी ही हृदय में याद हरदम लोचनों में जब सदा बैठे स्वयं तुम फ़िर अरे क्या देव, दानव क्या, मनुज क्या मैं जिसे पूजूँ जहाँ भी तुम वहीं साकार किसलिए आऊँ तुम्हारे द्वार? क्या कहा- सपना वहाँ साकार होगा मुक्ति और अमरत्व पर अधिकार होगा किन्तु मैं तो देव!… Continue reading अब न आउँगा / गोपालदास “नीरज”

रूके न जब तक साँस / गोपालदास “नीरज”

रुके न जब तक साँस, न पथ पर रुकना थके बटोही। साँसों से पहले ही जो पंथी पथ पर रुक जाता जग की नज़रों में कायर वह जीकर भी मर जाता चलते-चलते ही जो मिट जाता है किन्तु डगर पर उसके पथ की खाक विश्व मस्तक पर सदा चढ़ाता पथ पर साँसों की गति से… Continue reading रूके न जब तक साँस / गोपालदास “नीरज”

मैं तुम्हें अपना / गोपालदास “नीरज”

अजनबी यह देश, अनजानी यहां की हर डगर है, बात मेरी क्या- यहां हर एक खुद से बेखबर है किस तरह मुझको बना ले सेज का सिंदूर कोई जबकि मुझको ही नहीं पहचानती मेरी नजर है, आंख में इसे बसाकर मोहिनी मूरत तुम्हारी मैं सदा को ही स्वयं को भूल जाना चाहता हूं मैं तुम्हें… Continue reading मैं तुम्हें अपना / गोपालदास “नीरज”

खेल यह जीवन-मरण का / गोपालदास “नीरज”

आज तो अब बन्द कर दो खेल यह जीवन-मरण का। थक चुका तन, थक चुका मन, थक चुकी अभिलाषा मन की साँस भी चलती थकी सी, झूमती पुतली नयन की स्वेद, रज से लस्त जीवन बन गया है भार पग पर वह गरजती रात आती पोंछती लाली गगन की झर रहा सीमान्त-मुक्ता-फ़ूल दिन-कामिनि-किरण का आज… Continue reading खेल यह जीवन-मरण का / गोपालदास “नीरज”

बन्द कूलों में / गोपालदास “नीरज”

बन्द कूलों में समुन्दर का शरीर किन्तु सागर कूल का बन्धन नहीं है। धूल ने सीमित को असीमित किया है धूल ने अमरत्व मरघट को दिया है, और सबको तो मिला जग में हलाहल बस अकेली धूल ने अमृत पिया है धूल सौ-सौ बार मिटकर भी न मिटती क्योंकि उसके प्राण में धड़कन नहीं है।… Continue reading बन्द कूलों में / गोपालदास “नीरज”

मधुवन का यौवन / गोपालदास “नीरज”

नष्ट हुआ मधुवन का यौवन। जो थे मधुमय अमृत लुटाते जग जीवन का ताप मिटाते वही सुमन हैं आज ढूँढ़ते जग के कण-कण में दो जल-कण। नष्ट हुआ मधुवन का यौवन। कल जो तरू की स्वर्ण-शिखा पर थे अति सुदृढ़ और सुन्दर वर आज उन्हीं नीड़ों को देखो, लूट लिया झंझा ने तृण-तृण। नष्ट हुआ… Continue reading मधुवन का यौवन / गोपालदास “नीरज”

डगमगाते पाँव / गोपालदास “नीरज”

डगमगाते पाँव मेरे आज जीवन की डगर पर! आह-सा है संकुचित पथ बिछे काँटे, क्षीण पग-गति तम-बिछा, आँधी घिरी, बिजली चमकती और सर पर। डगमगाते पाँव मेरे आज जीवन की डगर पर! सामने ज्वाला धधकती प्राण प्यासे, श्वास रूँधती किन्तु विष मँडरा रहा है, हाय चिर प्यासे अधर पर। डगमगाते पाँव मेरे आज जीवन की… Continue reading डगमगाते पाँव / गोपालदास “नीरज”