नीरज दोहावली / गोपालदास “नीरज”

1 हे गणपति निज भक्त को, दो ऐसी निज भक्ति काव्य सृजन में ही रहे, जीवन-भर अनुरक्ति। 2 हे लम्बोदर है तुम्हें, बारंबार प्रणाम पूर्ण करो निर्विघ्न प्रभु ! सकल हमारे काम। 3 मेरे विषय-विकार जो, बने हृदय के शूल हे प्रभु मुझ पर कृपा कर, करो उन्हें निर्मूल। 4 गणपति महिमा आपकी, सचमुच बहुत… Continue reading नीरज दोहावली / गोपालदास “नीरज”

कानपुर के नाम / गोपालदास “नीरज”

कानपुर! आह!आज याद तेरी आई फिर स्याह कुछ और मेरी रात हुई जाती है, आँख पहले भी यह रोई थी बहुत तेरे लिए अब तो लगता है कि बरसात हुई जाती है. तू क्या रूठा मेरे चेहरे का रंग रूठ गया तू क्या छूटा मेरे दिल ने ही मुझे छोड़ दिया, इस तरह गम में… Continue reading कानपुर के नाम / गोपालदास “नीरज”

आज है तेरा जनम दिन, तेरी फुलबगिया में / गोपालदास “नीरज”

आज है तेरा जनम दिन, तेरी फुलबगिया में फूल एक और खिल गया है किसी माली का आज की रात तेरी उम्र के कच्चे घर में दीप एक और जलेगा किसी दीवाली का। आज वह दिन है किसी चौक पुरे आँगन में बोलने वाला खिलौना कोई जब आया था आज वह वक्त है जब चाँद… Continue reading आज है तेरा जनम दिन, तेरी फुलबगिया में / गोपालदास “नीरज”

शाम का वक्त है ढलते हुए सूरज की किरन / गोपालदास “नीरज”

शाम का वक्त है ढलते हुए सूरज की किरन दूर उस बाग में लेती है बसेरा अपना धुन्ध के बीच थके से शहर की आँखों में आ रही रात है अँजनाती अँधेरा अपना! ठीक छः दिन के लगातार इन्तजार के बाद आज ही आई है ऐ दोस्त ! तुम्हारी पाती आज ही मैंने जलाया है… Continue reading शाम का वक्त है ढलते हुए सूरज की किरन / गोपालदास “नीरज”

आज की रात बड़ी शोख बड़ी नटखट है / गोपालदास “नीरज”

आज की रात बड़ी शोख बड़ी नटखट है आज तो तेरे बिना नींद नहीं आयेगी आज तो तेरे ही आने का यहाँ मौसम है आज तबियत न ख़यालों से बहल पायेगी। देख ! वह छत पै उतर आई है सावन की घटा, खेल खिलाड़ी से रही आँख मिचौनी बिजली दर पै हाथों में लिये बाँसरी… Continue reading आज की रात बड़ी शोख बड़ी नटखट है / गोपालदास “नीरज”

आज की रात तुझे आख़िरी ख़त और लिख दूँ / गोपालदास “नीरज”

आज की रात तुझे आख़िरी ख़त और लिख दूँ कौन जाने यह दिया सुबह तक जले न जले ? बम्ब बारुद के इस दौर में मालूम नहीं ऐसी रंगीन हवा फिर कभी चले न चले। जिन्दगी सिर्फ है खूराक टैंक तोपों की और इन्सान है एक कारतूस गोली का सभ्यता घूमती लाशों की इक नुमाइश… Continue reading आज की रात तुझे आख़िरी ख़त और लिख दूँ / गोपालदास “नीरज”

कुछ दोहे नीरज के / गोपालदास “नीरज”

(1) मौसम कैसा भी रहे कैसी चले बयार बड़ा कठिन है भूलना पहला-पहला प्यार (2) भारत माँ के नयन दो हिन्दू-मुस्लिम जान नहीं एक के बिना हो दूजे की पहचान (3) बिना दबाये रस न दें ज्यों नींबू और आम दबे बिना पूरे न हों त्यों सरकारी काम (4) अमरीका में मिल गया जब से… Continue reading कुछ दोहे नीरज के / गोपालदास “नीरज”

अंतिम बूँद / गोपालदास “नीरज”

अंतिम बूँद बची मधु को अब जर्जर प्यासे घट जीवन में। मधु की लाली से रहता था जहाँविहँसता सदा सबेरा, मरघट है वह मदिरालय अब घिरा मौत का सघन अंधेरा, दूर गए वे पीने वाले जो मिट्टी के जड़ प्याले में- डुबो दिया करते थे हँसकर भाव हृदय का ‘मेरा-तेरा’, रूठा वह साकी भी जिसने… Continue reading अंतिम बूँद / गोपालदास “नीरज”

मगर निठुर न तुम रुके / गोपालदास “नीरज”

मगर निठुर न तुम रुके, मगर निठुर न तुम रुके! पुकारता रहा हृदय, पुकारते रहे नयन, पुकारती रही सुहाग दीप की किरन-किरन, निशा-दिशा, मिलन-विरह विदग्ध टेरते रहे, कराहती रही सलज्ज सेज की शिकन शिकन, असंख्य श्वास बन समीर पथ बुहारते रहे, मगर निठुर न तुम रुके! पकड़ चरण लिपट गए अनेक अश्रु धूल से, गुंथे… Continue reading मगर निठुर न तुम रुके / गोपालदास “नीरज”

यदि मैं होता घन सावन का / गोपालदास “नीरज”

पिया पिया कह मुझको भी पपिहरी बुलाती कोई, मेरे हित भी मृग-नयनी निज सेज सजाती कोई, निरख मुझे भी थिरक उठा करता मन-मोर किसी का, श्याम-संदेशा मुझसे भी राधा मँगवाती कोई, किसी माँग का मोती बनता ढल मेरा भी आँसू, मैं भी बनता दर्द किसी कवि कालिदास के मन का। यदि मैं होता घन सावन… Continue reading यदि मैं होता घन सावन का / गोपालदास “नीरज”