छिप-छिप अश्रु बहाने वालों / गोपालदास “नीरज”

छिप-छिप अश्रु बहाने वालों, मोती व्यर्थ बहाने वालों कुछ सपनों के मर जाने से, जीवन नहीं मरा करता है। सपना क्या है, नयन सेज पर सोया हुआ आँख का पानी और टूटना है उसका ज्यों जागे कच्ची नींद जवानी गीली उमर बनाने वालों, डूबे बिना नहाने वालों कुछ पानी के बह जाने से, सावन नहीं… Continue reading छिप-छिप अश्रु बहाने वालों / गोपालदास “नीरज”

कारवां गुज़र गया / गोपालदास “नीरज”

स्वप्न झरे फूल से, मीत चुभे शूल से, लुट गये सिंगार सभी बाग़ के बबूल से, और हम खड़े-खड़े बहार देखते रहे कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे! नींद भी खुली न थी कि हाय धूप ढल गई, पाँव जब तलक उठे कि ज़िन्दगी फिसल गई, पात-पात झर गये कि शाख़-शाख़ जल गई, चाह तो… Continue reading कारवां गुज़र गया / गोपालदास “नीरज”

दो गुलाब के फूल छू गए जब से होठ अपावन मेरे / गोपालदास “नीरज”

दो गुलाब के फूल छू गए जब से होठ अपावन मेरे ऐसी गंध बसी है मन में सारा जग मधुबन लगता है। रोम-रोम में खिले चमेली साँस-साँस में महके बेला, पोर-पोर से झरे मालती अंग-अंग जुड़े जुही का मेला पग-पग लहरे मानसरोवर, डगर-डगर छाया कदम्ब की तुम जब से मिल गए उमर का खंडहर राजभवन… Continue reading दो गुलाब के फूल छू गए जब से होठ अपावन मेरे / गोपालदास “नीरज”

मधुपुर के घनश्याम अगर कुछ पूछें हाल दुखी गोकुल का / गोपालदास “नीरज”

मधुपुर के घनश्याम अगर कुछ पूछें हाल दुखी गोकुल का उनसे कहना पथिक कि अब तक उनकी याद हमें आती है। बालापन की प्रीति भुलाकर वे तो हुए महल के वासी, जपते उनका नाम यहाँ हम यौवन में बनकर संन्यासी सावन बिना मल्हार बीतता, फागुन बिना फाग कट जाता, जो भी रितु आती है बृज… Continue reading मधुपुर के घनश्याम अगर कुछ पूछें हाल दुखी गोकुल का / गोपालदास “नीरज”

जब भी इस शहर में कमरे से मैं बाहर निकला / गोपालदास “नीरज

जब भी इस शहर में कमरे से मैं बाहर निकला, मेरे स्वागत को हर एक जेब से खंजर निकला । तितलियों फूलों का लगता था जहाँ पर मेला, प्यार का गाँव वो बारूद का दफ़्तर निकला । डूब कर जिसमे उबर पाया न मैं जीवन भर, एक आँसू का वो कतरा तो समुंदर निकला ।… Continue reading जब भी इस शहर में कमरे से मैं बाहर निकला / गोपालदास “नीरज

इसीलिए तो नगर -नगर / गोपालदास “नीरज

इसीलिए तो नगर-नगर बदनाम हो गये मेरे आँसू मैं उनका हो गया कि जिनका कोई पहरेदार नहीं था| जिनका दुःख लिखने की ख़ातिर मिली न इतिहासों को स्याही, क़ानूनों को नाखुश करके मैंने उनकी भरी गवाही जले उमर-भर फिर भी जिनकी अर्थी उठी अँधेरे में ही, खुशियों की नौकरी छोड़कर मैं उनका बन गया सिपाही… Continue reading इसीलिए तो नगर -नगर / गोपालदास “नीरज

मेरा नाम लिया जाएगा / गोपालदास “नीरज”

आँसू जब सम्मानित होंगे, मुझको याद किया जाएगा जहाँ प्रेम का चर्चा होगा, मेरा नाम लिया जाएगा मान-पत्र मैं नहीं लिख सका, राजभवन के सम्मानों का मैं तो आशिक़ रहा जन्म से, सुंदरता के दीवानों का लेकिन था मालूम नहीं ये, केवल इस ग़लती के कारण सारी उम्र भटकने वाला, मुझको शाप दिया जाएगा खिलने… Continue reading मेरा नाम लिया जाएगा / गोपालदास “नीरज”

धनिकों के तो धन हैं लाखों / गोपालदास “नीरज”

धनिकों के तो धन हैं लाखों मुझ निर्धन के धन बस तुम हो! कोई पहने माणिक माल कोई लाल जुड़ावे कोई रचे महावर मेंहदी मुतियन मांग भरावे सोने वाले चांदी वाले पानी वाले पत्थर वाले तन के तो लाखों सिंगार हैं मन के आभूषण बस तुम हो! धनिकों के तो धन हैं लाखों मुझ निर्धन… Continue reading धनिकों के तो धन हैं लाखों / गोपालदास “नीरज”

हाइकु / गोपालदास “नीरज”

जन्म मरण समय की गति के हैं दो चरण वो हैं अकेले दूर खडे होकर देखें जो मेले मेरी जवानी कटे हुये पंखों की एक निशानी हे स्वर्ण केशी भूल न यौवन है पंछी विदेशी वो है अपने देखें हो मैने जैसे झूठे सपने किससे कहें सब के सब दुख खुद ही सहें हे अनजानी… Continue reading हाइकु / गोपालदास “नीरज”

प्रथम प्यार के चुम्बन की तरह / गोपालदास “नीरज”

जब चले जाएंगे लौट के सावन की तरह , याद आएंगे प्रथम प्यार के चुम्बन की तरह | ज़िक्र जिस दम भी छिड़ा उनकी गली में मेरा जाने शरमाए वो क्यों गांव की दुल्हन की तरह | कोई कंघी न मिली जिससे सुलझ पाती वो जिन्दगी उलझी रही ब्रह्म के दर्शन की तरह | दाग… Continue reading प्रथम प्यार के चुम्बन की तरह / गोपालदास “नीरज”