चित्रकूट (3) / जयशंकर प्रसाद

सोते अभी खग-वृन्द थे निज नीड़ में आराम से ऊषा अभी निकली नहीं थी रविकरोज्ज्वल-दास से केवल टहनियाँ उच्च तरूगण की कभी हिलती रहीं मलयज पवन से विवस आपस में कभी मिलती रहीं ऊँची शिखर मैदान पर्णकुटीर, सब निस्तब्ध थे सब सो रहे; जैसे आभागों के दुखद प्रारब्ध थे झरने पहाड़र चल रहे थे, मधुर… Continue reading चित्रकूट (3) / जयशंकर प्रसाद

चित्रकूट (2) / जयशंकर प्रसाद

मधुर-मधुर अलाप करते ही पिय-गोद में मिठा सकल सन्ताप, वैदेही सोने लगी पुलकित-तनु ये राम, देख जानकी की दशा सुमन-स्पर्श अभिराम, सुख देता किसको नहीं नील गगन सम राम, अहा अंक में चन्द्रमुख अनुपम शोभधाम आभूषण थे तारका खुले हुए कच-भार बिखर गये थे बदन पर जैसे श्याम सिवार आसपास हो कमल के कैसा सुन्दर… Continue reading चित्रकूट (2) / जयशंकर प्रसाद

चित्रकूट (1) / जयशंकर प्रसाद

उदित कुमुदिनी-नाथ हुए प्राची में ऐसे सुधा-कलश रत्नाकार से उठाता हो जैसे धीरे-धीरे उठे गई आशा से मन में क्रीड़ा करने लगे स्वच्छ-स्वच्छन्द गगन में चित्रकूट भी चित्र-लिखा-सा देख रहा था मन्दाकिनी-तरंग उसी से खेल रहा था स्फटिक-शीला-आसीन राम-वैदेही ऐसे निर्मल सर में नील कमल नलिनी हो जैसे निज प्रियतम के संग सुखी थी कानन… Continue reading चित्रकूट (1) / जयशंकर प्रसाद

मकरन्द-विन्दु / जयशंकर प्रसाद

तप्त हृदय को जिस उशीर-गृह का मलयानिल शीतल करता शीघ्र, दान कर शान्ति को अखिल जिसका हृदय पुजारी है रखता न लोभ को स्वयं प्रकाशानुभव-मुर्ति देती न क्षोभ जो प्रकृति सुप्रांगण में सदा, मधुक्रीड़ा-कूटस्थ को नमस्कार मेरा सदा, पूरे विश्व-गृहस्थ को हैं पलक परदे खिचें वरूणी मधुर आधार से अश्रुमुक्ता की लगी झालर खुले दृग-द्वार… Continue reading मकरन्द-विन्दु / जयशंकर प्रसाद

गान / जयशंकर प्रसाद

जननी जिसकी जन्मभूमि हो; वसुन्धरा ही काशी हो विश्व स्वदेश, भ्रातृ मानव हों, पिता परम अविनाशी हो दम्भ न छुए चरण-रेणु वह धर्म नित्य-यौवनशाली सदा सशक्त करों से जिसकी करता रहता रखवाली शीतल मस्तक, गर्म रक्त, नीचा सिर हो, ऊँचा कर भी हँसती हो कमला जिसके करूणा-कटाक्ष में, तिस पर भी खुले-किवाड़-सदृश हो छाती सबसे… Continue reading गान / जयशंकर प्रसाद

धर्मनीति / जयशंकर प्रसाद

जब कि सब विधियाँ रहें निषिद्ध, और हो लक्ष्मी को निर्वेद कुटिलता रहे सदैव समृद्ध, और सन्तोष मानवे खेद वैध क्रम संयम को धिक्कार अरे तुम केवल मनोविकार वाँधती हो जो विधि सद्भाव, साधती हो जो कुत्सित नीति भग्न हो उसका कुटिल प्रभाव, धर्म वह फैलावेगा भीति भीति का नाशक हो तब धर्म नहीं तो… Continue reading धर्मनीति / जयशंकर प्रसाद

महाकवि तुलसीदास / जयशंकर प्रसाद

अखिल विश्व में रमा हुआ है राम हमारा सकल चराचर जिसका क्रीड़ापूर्ण पसारा इस शुभ सत्ता को जिसमे अनुभूत किया था मानवता को सदय राम का रूप दिया था नाम-निरूपण किया रत्न से मूल्य निकाला अन्धकार-भव-बीच नाम-मणि-दीपक बाला दीन रहा, पर चिन्तामणि वितरण करता था भक्ति-सुधा से जो सन्ताप हरण करता था प्रभु का निर्भय-सेवक… Continue reading महाकवि तुलसीदास / जयशंकर प्रसाद

नहीं डरते / जयशंकर प्रसाद

क्या हमने यह दिया, हुए क्यों रूष्ट हमें बतलाओ भी ठहरो, सुन लो बात हमारी, तनक न जाओ, आओ भी रूठ गये तुम नहीं सुनोगे, अच्छा ! अच्छी बात हुई सुहृद, सदय, सज्जन मधुमुख थे मुझको अबतक मिले कई सबको था दे चुका, बचे थे उलाहने से तुम मेरे वह भी अवसर मिला, कहूँगा हृदय… Continue reading नहीं डरते / जयशंकर प्रसाद

मिल जाओ गले / जयशंकर प्रसाद

देख रहा हूँ, यह कैसी कमनीयता छाया-सी कुसुमित कानन में छा रही अरे, तुम्हारा ही यह तो प्रतिबिम्ब है क्यों मुझको भुलवाते हो इनमे ? अजी तुम्हें नहीं पाकर क्या भूलेगा कभी मेरा हृदय इन्ही काँटों के फूल में जग की कृत्रिम उत्तमता का बस नहीं चल सकता है, बड़ा कठोर हृदय हुआ मानस-सर में… Continue reading मिल जाओ गले / जयशंकर प्रसाद

भाव-सागर / जयशंकर प्रसाद

थोड़ा भी हँसते देखा ज्योंही मुझे त्योही शीध्र रुलाने को उत्सुक हुए क्यों ईर्ष्या है तुम्हे देख मेरी दशा पूर्ण सृष्टि होने पर भी यह शून्यता अनुभव करके दृदय व्यथित क्यों हो रहा क्या इसमें कारण है कोई, क्या कभी और वस्तु से जब तक कुछ फिटकार ही मिलता नही हृदय को, तेरी ओर वह… Continue reading भाव-सागर / जयशंकर प्रसाद