मैं हरियाली के भीतर हूँ बाहर एक हरियाली है लताओं से सीखा है हर हाल में झूमना मुसीबतों में उन्हें बाकायदा झुकते भी देखा है उनके हिलने-डुलने में भीतर भी हिलते हैं कुछ पेड़ इस रंग में एक तृप्ति है उन्हें दीवार पर चढ़ते और खिलखिलाते देखा है मैंने सूरजमुखी अपने बचपन की तरह उसे… Continue reading भीतर-बाहर / त्रिनेत्र जोशी
Category: Trinetra Joshi
गर्मियाँ / त्रिनेत्र जोशी
गुमसुम से इस मौसम में जब नहीं आती हवाएँ सूखे होंठों वाली पत्तियाँ बार-बार चोंचें खोलती चिड़ियाएँ हरियाली पर लगी फफूँद कोई भी नहीं आता खिड़कियों के सामने पंख फड़फड़ाता उदास गुज़र जाती हैं लड़कियाँ और टहनियाँ खींचती हैं साँसें प्यास है चारों तरफ़ हाथ फैलाए हो गया है सोने का वक़्त उड़ गई है… Continue reading गर्मियाँ / त्रिनेत्र जोशी