वो हसरत-ए-बहार न तूफ़ान-ए-ज़िंदगी / सफ़िया शमीम

शम-ए-उम्मीद जला बैठे थे दिल में खुद आग लगा बैठे थे होश आया तो कहीं कुछ भी न था हम भी किसी बज़्म में जा बैठे था दश्त गुलज़ार हुआ जाता है क्या यहाँ अहल-ए-वफ़ा बैठे थे अब वहाँ हश्र उठा करते हैं कल जहाँ अहल-ए-वफ़ा बैठे थे

शम-ए-उम्मीद जला बैठे थे / सफ़िया शमीम

वो हसरत-ए-बहार न तूफ़ान-ए-ज़िंदगी आता है फिर रूलाने का अब्र बहार क्यूँ आलाम-ओ-ग़म की तुंद हवादिस के वास्ते इतना लतीफ़ दिल मिरे परवरदिगार क्यूँ जब ज़िंदगी का मौत से रिश्ता है मुंसलिक फिर हम-नशीं है ख़तरा-ए-लैल-हो-नहार क्यूँ जब रब्त-ओ-ज़ब्त हुस्न-ए-मोहब्बत नहीं रहा है बार-ए-दोश हस्ती-ए-ना-पाएदार क्यूँ रोना मुझे ख़िज़ाँ का नहीं कुछ मरग ‘शमीम’ इस… Continue reading शम-ए-उम्मीद जला बैठे थे / सफ़िया शमीम