करूँ मैं कहाँ तक मुदारात रोज़ तुम्हें चाहिए है वही बात रोज़ मुझे घर के लोगों का डर है कमाल करूँ किस तरह से मुलाक़ात रोज़ मिरा तेरा चर्चा है सब शहर में भला आऊँ क्यूँकर मैं हर रात रोज़ कहाँ तक सुनूँ कान तो उड़ गए तिरी सुनते सुनते हिकायात रोज़ गए हैं मिरे… Continue reading करूँ मैं कहाँ तक मुदारात रोज़ / रंगीन
Category: Saadat Yaar Khan Rangeen
अब मेरी दो-गाना को मिरा ध्यान है क्या ख़ाक / रंगीन
अब मेरी दो-गाना को मिरा ध्यान है क्या ख़ाक इंसान की अन्ना उसे पहचान है क्या ख़ाक मिलती नहीं वो मुझ को तुम्हीं अब तो बता दो इस बात में उस का अजी नुक़सान है क्या ख़ाक हैं याद बहाने तो उसे ऐसे बहुत से आने को यहाँ चाहिए सामान है क्या ख़ाक उल्फ़त मिरी… Continue reading अब मेरी दो-गाना को मिरा ध्यान है क्या ख़ाक / रंगीन