अफ़्सोस है गुल्शन ख़िज़ाँ लूट रही है शाख़े-गुले-तर सूख के अब टूट रही है इस क़ौम से वह आदते-देरीनये-ताअत बिलकुल नहीं छूटी है मगर छूट रही है
Category: Hindi-Urdu Poets
मुँह देखते हैं हज़रत / अकबर इलाहाबादी
मुँह देखते हैं हज़रत, अहबाब पी रहे हैं क्या शेख़ इसलिए अब दुनिया में जी रहे हैं मैंने कहा जो उससे, ठुकरा के चल न ज़ालिम हैरत में आके बोला, क्या आप जी रहे हैं? अहबाब उठ गए सब, अब कौन हमनशीं हो वाक़िफ़ नहीं हैं जिनसे, बाकी वही रहे हैं
हम कब शरीक होते हैं / अकबर इलाहाबादी
हम कब शरीक होते हैं दुनिया की ज़ंग में वह अपने रंग में हैं, हम अपनी तरंग में [ithoughts_tooltip_glossary-tooltip content=”खुल कर बोलना”]मफ़्तूह [/ithoughts_tooltip_glossary-tooltip]हो के भूल गए शेख़ अपनी बहस [ithoughts_tooltip_glossary-tooltip content=”तर्क शास्त्र-एक विषय”]मन्तिक़[/ithoughts_tooltip_glossary-tooltip] शहीद हो गई मैदाने ज़ंग में
तहज़ीब के ख़िलाफ़ है / अकबर इलाहाबादी
तहज़ीब के ख़िलाफ़ है जो लाये राह पर अब शायरी वह है जो उभारे गुनाह पर क्या पूछते हो मुझसे कि मैं खुश हूँ या मलूल यह बात मुन्हसिर[1] है तुम्हारी निगाह पर
काम कोई मुझे बाकी नहीं / अकबर इलाहाबादी
काम कोई मुझे बाकी नहीं मरने के सिवा कुछ भी करना नहीं अब कुछ भी न करने के सिवा हसरतों का भी मेरी तुम कभी करते हो ख़याल तुमको कुछ और भी आता है सँवरने के सिवा
मौत आई इश्क़ में / अकबर इलाहाबादी
मौत आई इश्क़ में तो हमें नींद आ गई निकली बदन से जान तो काँटा निकल गया बाज़ारे-मग़रिबी की हवा से ख़ुदा बचाए मैं क्या, महाजनों का दिवाला निकल गया
हो न रंगीन तबीयत / अकबर इलाहाबादी
हो न रंगीन तबीयत भी किसी की या रब आदमी को यह मुसीबत में फँसा देती है निगहे-लुत्फ़ तेरी बादे-बहारी है मगर गुंचए-ख़ातिरे-आशिक़ को खिला देती है
हाले दिल सुना नहीं सकता / अकबर इलाहाबादी
हाले दिल सुना नहीं सकता लफ़्ज़ मानी को पा नहीं सकता इश्क़ नाज़ुक मिज़ाज है बेहद अक़्ल का बोझ उठा नहीं सकता होशे-आरिफ़ की है यही पहचान कि ख़ुदी में समा नहीं सकता पोंछ सकता है हमनशीं आँसू दाग़े-दिल को मिटा नहीं सकता मुझको हैरत है इस कदर उस पर इल्म उसका घटा नहीं सकता
शेख़ जी अपनी सी बकते ही रहे / अकबर इलाहाबादी
शेख़ जी अपनी सी बकते ही रहे वह थियेटर में थिरकते ही रहे दफ़ बजाया ही किए मज़्मूंनिगार वह कमेटी में मटकते ही रहे सरकशों ने ताअते-हक़ छोड़ दी अहले-सजदा सर पटकते ही रहे जो गुबारे थे वह आख़िर गिर गए जो सितारे थे चमकते ही रहे
आबे ज़मज़म से कहा मैंने / अकबर इलाहाबादी
आबे ज़मज़म से कहा मैंने मिला गंगा से क्यों क्यों तेरी तीनत[1] में इतनी नातवानी[2] आ गई? वह लगा कहने कि हज़रत! आप देखें तो ज़रा बन्द था शीशी में, अब मुझमें रवानी आ गई