हूँ मैं परवाना मगर शम्मा तो हो रात तो हो जान देने को हूँ मौजूद कोई बात तो हो दिल भी हाज़िर सर-ए-तसलीम भी ख़म को मौजूद कोई मरकज़ हो कोई क़िबला-ए-हाजात तो हो दिल तो बे-चैन है इज़्हार-ए-इरादत के लिए किसी जानिब से कुछ इज़्हार-ए-करामात तो हो दिल-कुशा बादा-ए-साफ़ी का किसे ज़ौक़ नहीं बातिन-अफ़रोज़… Continue reading हूँ मैं परवाना मगर / अकबर इलाहाबादी
Category: Hindi-Urdu Poets
जहाँ में हाल मेरा / अकबर इलाहाबादी
जहाँ में हाल मेरा इस क़दर ज़बून हुआ कि मुझ को देख के बिस्मिल को भी सुकून हुआ ग़रीब दिल ने बहुत आरज़ूएँ पैदा कीं मगर नसीब का लिक्खा कि सब का ख़ून हुआ वो अपने हुस्न से वाक़िफ़ मैं अपनी अक़्ल से सैर उन्हों ने होश सँभाला मुझे जुनून हुआ उम्मीद-ए-चश्म-ए-मुरव्वत कहाँ रही बाक़ी… Continue reading जहाँ में हाल मेरा / अकबर इलाहाबादी
जो तुम्हारे लब-ए-जाँ-बख़्श / अकबर इलाहाबादी
जो तुम्हारे लब-ए-जाँ-बख़्श का शैदा होगा उठ भी जाएगा जहाँ से तो मसीहा होगा वो तो मूसा हुआ जो तालिब-ए-दीदार हुआ फिर वो क्या होगा कि जिस ने तुम्हें देखा होगा क़ैस का ज़िक्र मेरे शान-ए-जुनूँ के आगे अगले वक़्तों का कोई बादया-पैमा होगा आरज़ू है मुझे इक शख़्स से मिलने की बहुत नाम क्या… Continue reading जो तुम्हारे लब-ए-जाँ-बख़्श / अकबर इलाहाबादी
सदियों फ़िलासफ़ी की चुनाँ / अकबर इलाहाबादी
सदियों फ़िलासफ़ी की चुनाँ और चुनीं रही लेकिन ख़ुदा की बात जहाँ थी वहीं रही ज़ोर-आज़माइयाँ हुईं साइंस की भी ख़ूब ताक़त बढ़ी किसी की किसी में नहीं रही दुनिया कभी न सुल्ह पे माइल हुई मगर बाहम हमेशा बरसर-ए-पैकार-ओ-कीं रही पाया अगर फ़रोग़ तो सिर्फ़ उन नुफ़ूस ने जिन की कि ख़िज़्र-ए-राह फ़क़त शम्मा-ए-दीं… Continue reading सदियों फ़िलासफ़ी की चुनाँ / अकबर इलाहाबादी
वो हवा न रही वो चमन न रहा / अकबर इलाहाबादी
वो हवा न रही वो चमन न रहा वो गली न रही वो हसीं न रहे वो फ़लक न रहा वो समाँ न रहा वो मकाँ न रहे वो मकीं न रहे वो गुलों में गुलों की सी बू न रही वो अज़ीज़ों में लुत्फ़ की ख़ू न रही वो हसीनों में रंग-ए-वफ़ा न रहा… Continue reading वो हवा न रही वो चमन न रहा / अकबर इलाहाबादी
मायूस कर रहा है / अकबर इलाहाबादी
मायूस कर रहा है नई रोशनी का रंग इसका न कुछ अदब है न एतबार है तक़दीस मास्टर की न लीडर का फ़ातेहा यानी न नूरे-दिल है, न शमये मज़ार है
जो हस्रते दिल है / अकबर इलाहाबादी
जो हस्रते दिल है, वह निकलने की नहीं जो बात है काम की, वह चलने की नहीं यह भी है बहुत कि दिल सँभाले रहिए क़ौमी हालत यहाँ सँभलने की नहीं
ख़ैर उनको कुछ न आए / अकबर इलाहाबादी
ख़ैर उनको कुछ न आए फाँस लेने के सिवा मुझको अब करना ही क्या है साँस लेने के सिवा थी शबे-तारीक, चोर आए, जो कुछ था ले गए कर ही क्या सकता था बन्दा खाँस लेने के सिवा
उससे तो इस सदी में / अकबर इलाहाबादी
उससे तो इस सदी में नहीं हम को कुछ ग़रज़ सुक़रात बोले क्या और अरस्तू ने क्या कहा बहरे ख़ुदा ज़नाब यह दें हम को इत्तेला साहब का क्या जवाब था, बाबू ने क्या कहा
ग़म क्या / अकबर इलाहाबादी
ग़म क्या जो आसमान है मुझसे फिरा हुआ मेरी नज़र से ख़ुद है ज़माना घिरा हुआ मग़रिब ने खुर्दबीं से कमर उनकी देख ली मशरिक की शायरी का मज़ा किरकिरा हुआ