यारो कू-ए-यार की बातें करें फिर गुल ओ गुल-ज़ार की बातें करें चाँदनी में ऐ दिल इक इक फूल से अपने गुल-रुख़्सार की बातें करें आँखों आँखों में लुटाए मै-कदे दीदा-ए-सरशार की बातें करें अब तो मिलिए बस लड़ाई हो चुकी अब तो चलिए प्यार की बातें करें फिर महक उट्ठे फ़ज़ा-ए-ज़िंदगी फिर गुल ओ… Continue reading यारो कू-ए-यार की बातें करें / ‘अख्तर’ शीरानी
Category: Hindi-Urdu Poets
वो कभी मिल जाएँ तो / ‘अख्तर’ शीरानी
वो कभी मिल जाएँ तो क्या कीजिए रात दिन सूरत को देखा कीजिए चाँदनी रातों में इक इक फूल को बे-ख़ुदी कहती है सजदा कीजिए जो तमन्ना बर न आए उम्र भर उम्र भर उस की तमन्ना कीजिए इश्क़ की रंगीनियों में डूब कर चाँदनी रातों में रोया कीजिए पूछ बैठे हैं हमारा हाल वो… Continue reading वो कभी मिल जाएँ तो / ‘अख्तर’ शीरानी
वादा उस माह-रू के आने का / ‘अख्तर’ शीरानी
वादा उस माह-रू के आने का ये नसीबा सियाह-ख़ाने का कह रही है निगाह-ए-दुज़-दीदा रुख़ बदलने को है ज़माने का ज़र्रे ज़र्रे में बे-हिजाब हैं वो जिन को दावा है मुँह छुपाने का हासिल-ए-उम्र है शबाब मगर इक यही वक़्त है गँवाने का चाँदनी ख़ामोशी और आख़िर शब आ के है वक़्त दिल लगाने का… Continue reading वादा उस माह-रू के आने का / ‘अख्तर’ शीरानी
कुछ तो तंहाई की रातों में / ‘अख्तर’ शीरानी
कुछ तो तन्हाई की रातों में सहारा होता तुम न होते न सही ज़िक्र तुम्हारा होता तर्क-ए-दुनिया का ये दावा है फ़ुज़ूल ऐ ज़ाहिद बार-ए-हस्ती तो ज़रा सर से उतारा होता वो अगर आ न सके मौत ही आई होती हिज्र में कोई तो ग़म-ख़्वार हमारा होता ज़िन्दगी कितनी मुसर्रत से गुज़रती या रब ऐश… Continue reading कुछ तो तंहाई की रातों में / ‘अख्तर’ शीरानी
किस को देखा है ये हुआ क्या है / ‘अख्तर’ शीरानी
किस को देखा है ये हुआ क्या है दिल धड़कता है माजरा क्या है इक मोहब्बत थी मिट चुकी या रब तेरी दुनिया में अब धरा क्या है दिल में लेता है चुटकियाँ कोई है इस दर्द की दवा क्या है हूरें नेकों में बँट चुकी होंगी बाग़-ए-रिज़वाँ में अब रखा क्या है उस के… Continue reading किस को देखा है ये हुआ क्या है / ‘अख्तर’ शीरानी
झूम कर बदली उठी और छा गई / ‘अख्तर’ शीरानी
झूम कर बदली उठी और छा गई सारी दुनिया पर जवानी आ गई आह वो उस की निगाह-ए-मय-फ़रोश जब भी उट्ठी मस्तियाँ बरसा गई गेसू-ए-मुश्कीं में वो रू-ए-हसीं अब्र में बिजली सी इक लहरा गई आलम-ए-मस्ती की तौबा अल-अमाँ पारसाई नश्शा बन कर छा गई आह उस की बे-नियाज़ी की नज़र आरज़ू क्या फूल सी… Continue reading झूम कर बदली उठी और छा गई / ‘अख्तर’ शीरानी
ऐ दिल वो आशिक़ी के / ‘अख्तर’ शीरानी
ऐ दिल वो आशिक़ी के फ़साने किधर गए वो उम्र क्या हुई वो ज़माने किधर गए वीराँ हैं सहन-ओ-बाग़ बहारों को क्या हुआ वो बुलबुलें कहाँ वो तराने किधर गए है नज्द में सुकूत हवाओं को क्या हुआ लैलाएँ हैं ख़मोश दिवाने किधर गए उजड़े पड़े हैं दश्त ग़ज़ालों पे क्या बनी सूने हैं कोहसार… Continue reading ऐ दिल वो आशिक़ी के / ‘अख्तर’ शीरानी
शाम और मज़दूर-4 / अख़्तर यूसुफ़
शाम और मज़दूर बहुत पास-पास बैठे थे मिट्टी की डोंगी में गुड़ की चाय पीते थे महुआ के खेतों से पछुआ सीधी चली आती थी तेज़ कभी होती थी और कभी धीमी ख़ुशबू तेज़ महुआ की गुड़ की चाय जैसे कि बस भड़क-सी दारू दोनों को नशा था झोंपड़ी मज़दूर की महुआ की ख़ुशबू में… Continue reading शाम और मज़दूर-4 / अख़्तर यूसुफ़
शाम और मज़दूर-3 / अख़्तर यूसुफ़
मज़दूर शाम के साथ घर लौट रहा है गलियाँ जल्दी और जल्दी सुनसान हो रही हैं गाँव में कभी बिजली नहीं आती है अकसर गिर जाती है तेल मिट्टी का अब शहर में लोग पीते हैं अधर का पानी मरता जाता है मज़दूर और शाम जाने कब से साथ-साथ जीते हैं और रोज़ झोंपड़ी के… Continue reading शाम और मज़दूर-3 / अख़्तर यूसुफ़
शाम और मज़दूर-2 / अख़्तर यूसुफ़
शाम और मज़दूर दोनों नदी में अपना मुँह धोते हैं दिन भर की धूल गर्द चेहरों पे जमी थी थक गए थे दोनों शाम और मज़दूर सोच रहे थे कुटिया जल्दी से पहुँचेंगे मिलकर दोनों खाएंगे रोटी और गुड़ फिर गुड़ की ही चाय बनाएंगे मिलकर दोनों सोंधी-सोंधी चुसकियाँ लेंगे सोच मज़दूर की गुड़ की… Continue reading शाम और मज़दूर-2 / अख़्तर यूसुफ़