कवि वरयाम सिंह के लिए मेरी गहरी नींद में उसने टार्च की लम्बी रोशनी फेंकी और मैंने उसे अपने अन्दर गिरती बर्फ़ में पेड़ के नीचे खड़े देखा रात के घने अंधेरे में कहा उसने मैं न तुमसे प्रेम करूंगी और न विवाह मैं बचाना चाहती हूँ तुम्हें ध्वस्त होने से मैंने उसे अपनी माँ… Continue reading मरीना स्विताएवा / अग्निशेखर
Category: Hindi-Urdu Poets
थोड़ा-सा प्रकाश / अग्निशेखर
मेरी सोई हुई माँ के चेहरे पर किसीछिद्र से पड़ रहा है थोड़ा-सा प्रकाश हिल रही हैं उसकी पलकें कौन कर रहा है इस अंधेरे में सुबह की बात
तड़प / अग्निशेखर
अरे, मेरा करो अपहरण ले जाओ मुझे अपने यातना-शिविर में कुछ नहीं कहूंगा मैं करो जो कुछ भी करना है मेरे शरीर के साथ ज़िन्दा जलाओ, काटो उआ दफ़न करो कहीं मुझे नदी के किनारे बर्फ़ीले पहाड़ों पर किसी गाँव में या कस्बाई गली में कहीं घूरे के नीचे मैं तरस गया हूँ अपनी ज़मीन… Continue reading तड़प / अग्निशेखर
ज़मीन पर ही रहे आसमाँ के होते हुए / अख़्तर होश्यारपुरी
ज़मीन पर ही रहे आसमाँ के होते हुए कहीं न घर से गए कारवाँ के होते हुए मैं किस का नाम न लूँ और नाम लूँ किस का हज़ारों फूल खिले थे ख़िज़ाँ के होते हुए बदन कि जैसे हवाओं की ज़द में कोई चराग़ ये अपना हाल था इक मेहरबाँ के होते हुए हमें… Continue reading ज़मीन पर ही रहे आसमाँ के होते हुए / अख़्तर होश्यारपुरी
वो रतजगा था कि अफ़्सून-ए-ख़्वाब तारी था / अख़्तर होश्यारपुरी
वो रतजगा था कि अफ़्सून-ए-ख़्वाब तारी था दिए की लौ पे सितारों का रक़्स जारी था मैं उस को देखता था दम-ब-ख़ुद था हैराँ था किसे ख़बर वो कड़ा वक़्त कितना भारी था गुज़रते वक़्त ने क्या क्या न चारा साज़ी की वगरना ज़ख़्म जो उस ने दिया था कारी था दयार-ए-जाँ में बड़ी देर… Continue reading वो रतजगा था कि अफ़्सून-ए-ख़्वाब तारी था / अख़्तर होश्यारपुरी
उफ़ुक़ उफ़़ुक़ नए सूरज निकलते रहते हैं / अख़्तर होश्यारपुरी
उफ़ुक़ उफ़़ुक़ नए सूरज निकलते रहते हैं दिए जलें न जलें दाग़ जलते रहते हैं मिरी गली के मकीं ये मिरे रफ़ीक़-ए-सफ़र ये लोग वो हैं जो चेहरे बदलते रहते हैं ज़माने को तो हमेशा सफ़र में रहना है जो क़ाफ़िले न चले रस्ते चलते रहते हैं हज़ार संग-ए-गिराँ हो हज़ार जब्र-ए-ज़माँ मगर हयात के… Continue reading उफ़ुक़ उफ़़ुक़ नए सूरज निकलते रहते हैं / अख़्तर होश्यारपुरी
तिलिस्म-ए-गुम्बद-ए-बे-दर किसी पे वा न हुआ / अख़्तर होश्यारपुरी
तिलिस्म-ए-गुम्बद-ए-बे-दर किसी पे वा न हुआ शरर तो लपका मगर शोला-ए-सदा न हुआ हमें ज़माने ने क्या क्या न आइने दिखलाए मगर वो अक्स जो आईना-आशना न हुआ बयाज़-ए-जाँ में सभी शेर ख़ूब-सूरत थे किसी भी मिसरा-ए-रंगीं का हाशिया न हुआ न जाने लोग ठहरते हैं वक़्त-ए-शाम कहाँ हमें तो घर में भी रूकने का… Continue reading तिलिस्म-ए-गुम्बद-ए-बे-दर किसी पे वा न हुआ / अख़्तर होश्यारपुरी
थी तितलियों के तआक़ुब में ज़िंदगी मेरी / अख़्तर होश्यारपुरी
थी तितलियों के तआक़ुब में ज़िंदगी मेरी वो शहर क्या हुआ जिस की थी हर गली मेरी मैं अपनी ज़ात की तशरीह करता फिरता था न जाने फिर कहाँ आवाज़ खो गई मेरी ये सरगुज़िश्त-ए-ज़माना ये दास्तान-ए-हयात अधूर बात में भी रह गई कमी मेरी हवा-ए-कोह-ए-निदा इक ज़रा ठहर कि अभी ज़माना ग़ौर से सुनता… Continue reading थी तितलियों के तआक़ुब में ज़िंदगी मेरी / अख़्तर होश्यारपुरी
मेरे लहू में उस ने नया रंग भर दिया / अख़्तर होश्यारपुरी
मेरे लहू में उस ने नया रंग भर दिया सूरज की रौशनी ने बड़ा काम कर दिया हाथों पे मेरे अपने लहू का निशान था लोगों ने उस के क़त्ल का इल्ज़ाम धर दिया गंदुम का बीज पानी की छागल और इक चराग़ जब मैं चला तो उस ने ये ज़ाद-ए-सफ़र दिया जागा तो माहताब… Continue reading मेरे लहू में उस ने नया रंग भर दिया / अख़्तर होश्यारपुरी
मंज़िलों के फ़ासले दीवार-ओ-दर में रह गए / अख़्तर होश्यारपुरी
मंज़िलों के फ़ासले दीवार-ओ-दर में रह गए क्या सफ़र था मेरे सारे ख़्वाब घर में रह गए अब कोई तस्वीर भी अपनी जगह क़ाएम नहीं अब हवा के रंग ही मेरी नज़र में रह गए जितने मंज़र थे मिरे हम-राह घर तक आए हैं और पस-ए-मंज़र सवाद-ए-रह-गुज़र में रह गए अपने क़दमों के निशाँ भी… Continue reading मंज़िलों के फ़ासले दीवार-ओ-दर में रह गए / अख़्तर होश्यारपुरी