किसी शय पे यहाँ वक़्त का साया नहीं होता इक ख़्वाब-ए-मोहब्बत है के बूढ़ा नहीं होता वो वक़्त भी आता है जब आँखों में हमारी फिरती हैं वो शक्लें जिन्हें देखा नहीं होता बारिश वो बरसती है के भर जाते हैं जल-थल देखो तो कहीं अब्र का टुकड़ा नहीं होता घिर जाता है दिल दर्द… Continue reading किसी शय पे यहाँ वक़्त का साया नहीं होता / अहमद मुश्ताक़
Category: Hindi-Urdu Poets
ख़ैर औरों ने भी चाहा तो है तुझ सा होना / अहमद मुश्ताक़
ख़ैर औरों ने भी चाहा तो है तुझ सा होना ये अलग बात के मुमकिन नहीं ऐसा होना देखता और न ठहरता तो कोई बात भी थी जिस ने देखा ही नही उस से ख़फ़ा क्या होना तुझ से दूरी में भी ख़ुश रहता हूँ पहले की तरह बस किसी वक़्त बुरा लगता है तन्हा… Continue reading ख़ैर औरों ने भी चाहा तो है तुझ सा होना / अहमद मुश्ताक़
खड़े हैं दिल में जो बर्ग-ओ-समर लगाए हुए / अहमद मुश्ताक़
खड़े हैं दिल में जो बर्ग-ओ-समर लगाए हुए तुम्हारे हाथ के हैं ये शजर लगाए हुए बहुत उदास हो तुम और मैं भी बैठा हूँ गए दिनों की कमर से कमर लगाए हुए अभी सिपाह-ए-सितम ख़ेमा-ज़न है चार तरफ़ अभी पड़े रहो ज़ंजीर-ए-दर लगाए हुए कहाँ कहाँ न गए आलम-ए-ख़याल में हम नज़र किसी के… Continue reading खड़े हैं दिल में जो बर्ग-ओ-समर लगाए हुए / अहमद मुश्ताक़
कहूँ किस से रात का माजरा नए मंज़रों / अहमद मुश्ताक़
कहूँ किस से रात का माजरा नए मंज़रों पे निगाह थी न किसी का दामन-ए-चाक था न किसी की तर्फ़-ए-कुलाह थी कई चाँद थे सर-ए-आसमाँ के चमक चमक के पलट गए न लहू मेरे ही जिगर में था न तुम्हारी ज़ुल्फ़-ए-सियाह थी दिल-ए-कम-अलम पे वो कैफ़ियत के ठहर सके न गुज़र सके न हज़र ही… Continue reading कहूँ किस से रात का माजरा नए मंज़रों / अहमद मुश्ताक़
कहाँ की गूँज दिल-ए-ना-तवाँ में रहती है / अहमद मुश्ताक़
कहाँ की गूँज दिल-ए-ना-तवाँ में रहती है के थरथरी सी अजब जिस्म ओ जाँ में रहती है क़दम क़दम पे वही चश्म ओ लब वही गेसू तमाम उम्र नज़र इम्तिहाँ में रहती है मज़ा तो ये है के वो ख़ुद तो है नए घर में और उस की याद पुराने मकाँ में रहती है पता… Continue reading कहाँ की गूँज दिल-ए-ना-तवाँ में रहती है / अहमद मुश्ताक़
इन मौसमों में नाचते गाते रहेंगे हम / अहमद मुश्ताक़
इन मौसमों में नाचते गाते रहेंगे हम हँसते रहेंगे शोर मचाते रहेंगे हम लब सूख क्यूँ न जाएँ गला बैठ क्यूँ न जाए दिल में हैं जो सवाल उठाते रहेंगे हम अपनी रह-ए-सुलूक में चुप रहना मना है चुप रह गए तो जान से जाते रहेंगे हम निकले तो इस तरह के दिखाई नहीं दिए… Continue reading इन मौसमों में नाचते गाते रहेंगे हम / अहमद मुश्ताक़
हर लम्हा ज़ुल्मतों की ख़ुदाई का वक़्त है / अहमद मुश्ताक़
हर लम्हा ज़ुल्मतों की ख़ुदाई का वक़्त है शायद किसी की चेहरा-नुमाई का वक़्त है कहती है साहिलों से ये जाते समय की धूप हुश्यार नद्दियों की चढ़ाई का वक़्त है होती है शाम आँख से आँसू रवाँ हुए ये वक़्त क़ैदियों की रिहाई का वक़्त है कोई भी वक़्त हो कभी होता नहीं जुदा… Continue reading हर लम्हा ज़ुल्मतों की ख़ुदाई का वक़्त है / अहमद मुश्ताक़
हाथ से नापता हूँ दर्द की गहराई को / अहमद मुश्ताक़
हाथ से नापता हूँ दर्द की गहराई को ये नया खेल मिला है मेरी तन्हाई को था जो सीने में चराग़-ए-दिल-पुर-ख़ूँ न रहा चाटिए बैठ के अब सब्र ओ शकेबाई को दिल-ए-अफ़सुर्दा किसी तरह बहलता ही नहीं क्या करें आप की इस हौसला-अफ़ज़ाई को ख़ैर बद-नाम तो पहले भी बहुत थे लेकिन तुझ से मिलना… Continue reading हाथ से नापता हूँ दर्द की गहराई को / अहमद मुश्ताक़
दुनिया में सुराग़-ए-रह-ए-दुनिया नहीं मिलता / अहमद मुश्ताक़
दुनिया में सुराग़-ए-रह-ए-दुनिया नहीं मिलता दरिया में उतर जाएँ तो दरिया नहीं मिलता बाक़ी तो मुकम्मल है तमन्ना की इमारत इक गुज़रे हुए वक़्त का शीशा नहीं मिलता जाते हुए हर चीज़ यहीं छोड़ गया था लौटा हूँ तो इक धूप का टुकड़ा नहीं मिलता जो दिल में समाए थे वो अब शामिल-ए-दिल हैं इस… Continue reading दुनिया में सुराग़-ए-रह-ए-दुनिया नहीं मिलता / अहमद मुश्ताक़
दिलों की ओर धुआँ सा दिखाई देता है / अहमद मुश्ताक़
दिलों की ओर धुआँ सा दिखाई देता है ये शहर तो मुझे जलता दिखाई देता है जहाँ के दाग़ है याँ आगे दर्द रहता था मगर ये दाग़ भी जाता दिखाई देता है पुकारती हैं भरे शहर की गुज़र-गाहें वो रोज़ शाम को तन्हा दिखाई देता है ये लोग टूटी हुई कश्तियों में सोते हैं… Continue reading दिलों की ओर धुआँ सा दिखाई देता है / अहमद मुश्ताक़