निष्ठुर इतना तो बतलाते! कौन भूल ऐसी की हमनें जो यह दण्ड दिया है तुमने थमते अश्रु न और भूलकर होंठ कभी मुस्काते। निष्ठुर इतना तो बतलाते! तोड़ प्रेम के बन्धन सारे जाना था यूँ ही यदि प्यारे ले जाते निज याद, हृदय मेरा मुझको दे जाते। निष्ठुर इतना तो बतलाते! तो अकुलाते प्राण न… Continue reading इतना तो बतलाते / गोपालदास “नीरज”
Category: Gopaldas Neeraj
मैं अमृत-मंथन क्या जानूँ / गोपालदास “नीरज”
मैंने जीवन विषपान किया, मैं अमृत-मंथन क्या जानूँ! मैं दीवानों का भेष लिए, सुख-दु:ख का चिन्तन क्या जानूँ! शैशव में ही जैसे मैंने, जीवन का चिर-अभाव चूमा यौवन के चंचल दिवसों में, बस हारा हुआ दाँव चूमा मैं चूमा करता अंगारे, फ़िर मधुमय चुम्बन क्या जानूँ। अपनी पलकों में रो-रो कर मैं नित मदिरा पी… Continue reading मैं अमृत-मंथन क्या जानूँ / गोपालदास “नीरज”
आज मेरी गोद में / गोपालदास “नीरज”
आज मेरी गोद में शरमा रहा कोई चाँद से कह दो नहीं वह मुस्कुराए। जा बहारों से कहो बोले न बुलबुल क्योंकि अनबोली कहानी चल रही है जा सितारों के बुझा दो दीप सारे क्योंकि पानी बिन जवानी जल रही है अब पिया को और मत टेरे पपीहा क्योंकि सीने में धड़कता दिल किसी का… Continue reading आज मेरी गोद में / गोपालदास “नीरज”
कल का करो न ध्यान / गोपालदास “नीरज”
आज पिला दो जी भर कर मधु कल का करो न ध्यान सुनयने। कल का करो न ध्यान! संभव है कल तक मिट जाए, मधु के प्रति आकर्षण मन का मधु पीने के लिए न हो, कल संभव है संकेत गगन का पीने और पिलाने को हम ही न रहें कल संभव यह भी पल-पल… Continue reading कल का करो न ध्यान / गोपालदास “नीरज”
मेरा कितना पागलपन था / गोपालदास “नीरज”
मेरा कितना पागलपन था! मादक मधु-मदिरा के प्याले जाने कितने ही पी डाले पर ठुकराया उस प्याले को, जिससे था मधु पीना सीखा। मेरा कितना पागलपन था! जिस जल का पार नहीं पाया मँझधार मुझे उसका भाया फ़िर उसके रौरव में अपने प्राणों का रव खोना सीखा। मेरा कितना पागलपन था! जो मेरे प्राणों में… Continue reading मेरा कितना पागलपन था / गोपालदास “नीरज”
मैं क्यों प्यार किया करता हूँ? / गोपालदास “नीरज”
मैं क्यों प्यार किया करता हूँ? सर्वस देकर मौन रुदन का क्यों व्यापार किया करता हूँ? भूल सकूँ जग की दुर्घातें उसकी स्मृति में खोकर ही जीवन का कल्मष धो डालूँ अपने नयनों से रोकर ही इसीलिए तो उर-अरमानों को मैं छार किया करता हूँ। मैं क्यों प्यार किया करता हूँ? कहता जग पागल मुझसे,… Continue reading मैं क्यों प्यार किया करता हूँ? / गोपालदास “नीरज”
तुम गए चितचोर / गोपालदास “नीरज”
तुम गए चितचोर! स्वप्न-सज्जित प्यार मेरा कल्पना का तार मेरा एक क्षण में मधुर निष्ठुर तुम गए झकझोर। तुम गए चितचोर! हाय! जाना ही तुम्हें था यों रुलाना ही मुझे था तुम गए प्रिय! पर गए क्यों नहीं हृदय मरोर। तुम गए चितचोर! लुट गया सर्वस्व मेरा नयन में इतना अँधेरा घोर निशि में भी… Continue reading तुम गए चितचोर / गोपालदास “नीरज”
निभाना ही कठिन है / गोपालदास “नीरज”
प्यार तो करना बहुत आसान प्रेयसि! अन्त तक उसका निभाना ही कठिन है। है बहुत आसान ठुकराना किसी को, है न मुश्किल भूल भी जाना किसी को, प्राण-दीपक बीच साँसों को हवा में याद की बाती जलाना ही कठिन है प्यार तो करना बहुत आसान प्रेयसि! अन्त तक उसका निभाना ही कठिन है। स्वप्न बन… Continue reading निभाना ही कठिन है / गोपालदास “नीरज”
हार न अपनी मानूँगा / गोपालदास “नीरज”
हार न अपनी मानूँगा मैं! चाहे पथ में शूल बिछाओ, चाहे ज्वालामुखी बसाओ, किन्तु मुझे अब जाना ही है- तलवारों की धारों पर भी हँस कर पैर बढ़ा लूँगा मैं। हार न अपनी मानूँगा मैं! मन में मरु-सी प्यास जगाओ, रस की बूंद नहीं बरसाओ, किन्तु मुझे जब जीना ही है- मसल-मसल कर उर के… Continue reading हार न अपनी मानूँगा / गोपालदास “नीरज”
बन्द करो मधु की / गोपालदास “नीरज”
बहुत दिनों तक हुआ प्रणय का रास वासना के आंगन में, बहुत दिनों तक चला तृप्ति-व्यापार तृषा के अवगुण्ठन में, अधरों पर धर अधर बहुत दिन तक सोई बेहोश जवानी, बहुत दिनों तक बंधी रही गति नागपाश से आलिंगन में, आज किन्तु जब जीवन का कटु सत्य मुझे ललकार रहा है कैसे हिले नहीं सिंहासन… Continue reading बन्द करो मधु की / गोपालदास “नीरज”