Wali Uzlat Archive

बहार आई ब-तंग आया दिल-ए-वहशत / वली ‘उज़लत’

बहार आई ब-तंग आया दिल-ए-वहशत पनाह अपना करूँ क्या है यही चाक-ए-गिरेबाँ दस्त-गाह अपना टपकती जो तरह सुम्बुल से होवे पै-ब-पै शबनम हमारे हाल पर रोने लगा अब दूद-ए-आह अपना मेरा दिल लेते ही कर चश्म-पोशी मुझ से मुँह फेरा …

आज दिल बे-क़रार है मेरा / वली ‘उज़लत’

आज दिल बे-क़रार है मेरा किस के पहलू में यार है मेरा क्यूँ न उश्शाक़ पर होऊँ मंसूर जूँ सिपंद आह दार है मेरा बे-क़रार उस का हूँगा हश्र में भी यही उस से क़रार है मेरा रंग-ए-ज़र्द और सरिश्क-ए-सुर्ख़ …