Wali Deccani Archive

दिल को लगती है / वली दक्कनी

दिल को लगती है दिलरुबा की अदा जी में बसती है खुश-अदा की अदा गर्चे सब ख़ूबरू हैं ख़ूब वले क़त्ल करती है मीरज़ा की अदा हर्फ़-ए-बेजा बजा है गर बोलूँ दुश्मन-ए-होश है पिया की अदा नक़्श-ए-दीवार क्यूँ न हो …

याद करना हर घडी़ उस यार का / वली दक्कनी

याद करना हर घड़ी उस यार का है वज़ीफ़ा मुझ दिल-ए-बीमार का आरज़ू-ए-चश्मा-ए-कौसर नहीं तिश्नालब हूँ शर्बत-ए-दीदार का आकबत क्या होवेगा मालूम नहीं दिल हुआ है मुब्तिला दिलदार का क्या कहे तारीफ़ दिल है बेनज़ीर हर्फ़ हर्फ़ उस मख़्ज़न-ए-इसरार का …